Sunday, September 18, 2011

अयोध्या में कब-कब क्या हुआ?


<span title=बाबरी मस्जिद" width="466" height="262">

अयोध्या विवाद भारत के हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच तनाव का एक प्रमुख मुद्दा रहा है और देश की राजनीति को एक लंबे अरसे से प्रभावित करता रहा है.

भारतीय जनता पार्टी और विश्वहिंदू परिषद सहित कई हिंदू संगठनों का दावा है कि हिंदुओं के आराध्यदेव राम का जन्म ठीक वहीं हुआ जहाँ बाबरी मस्जिद थी.

उनका दावा है कि बाबरी मस्जिद दरअसल एक मंदिर को तोड़कर बनवाई गई थी और इसी दावे के चलते छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दी गई.

इसके अलावा वहाँ ज़मीन के मालिकाना कब्ज़े का विवाद है.

मामले-मुक़दमे अदालतों में चल रहे हैं और इस बीच लिब्राहन आयोग ने अपनी रिपोर्ट दे दी है.

जानिए अयोध्या में कैसे घूमा है समय का पहिया पिछली पाँच सदियों में.

1528: अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर एक मस्जिद का निर्माण किया गया जिसे कुछ हिंदू अपने आराध्य देवता राम का जन्म स्थान मानते हैं. समझा जाता है कि मुग़ल सम्राट बाबर ने यह मस्जिद बनवाई थी जिस कारण इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था.

<span title=हिंदू" width="226" height="300">

हिंदू उस जगह पर राम मंदिर बनाना चाहते हैं

1853: पहली बार इस स्थल के पास सांप्रदायिक दंगे हुए.

1859: ब्रितानी शासकों ने विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी और परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दे दी.

1949: भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गयीं. कथित रुप से कुछ हिंदूओं ने ये मूर्तियां वहां रखवाईं थीं. मुसलमानों ने इस पर विरोध व्यक्त किया और दोनों पक्षों ने अदालत में मुकदमा दायर कर दिया. सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित करके ताला लगा दिया.

1984: कुछ हिंदुओं ने विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में भगवान राम के जन्म स्थल को "मुक्त" करने और वहाँ राम मंदिर का निर्माण करने के लिए एक समिति का गठन किया. बाद में इस अभियान का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी के एक प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संभाल लिया.

1986: ज़िला मजिस्ट्रेट ने हिंदुओं को प्रार्थना करने के लिए विवादित मस्जिद के दरवाज़े पर से ताला खोलने का आदेश दिया. मुसलमानों ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन किया.

1989: विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए अभियान तेज़ किया और विवादित स्थल के नज़दीक राम मंदिर की नींव रखी.

1990: विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद को कुछ नुक़सान पहुँचाया. तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने वार्ता के ज़रिए विवाद सुलझाने के प्रयास किए मगर अगले वर्ष वार्ताएँ विफल हो गईं.

1992: विश्व हिंदू परिषद, शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया. इसके परिणामस्वरूप देश भर में हिंदू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे जिसमें 2000 से ज़्यादा लोग मारे गए.

1998: प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने गठबंधन सरकार बनाई.

2001: बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी पर तनाव बढ़ गया और विश्व हिंदू परिषद ने विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण करने के अपना संकल्प दोहराया.

<span title=मस्जिद ढहाते कारसेवक" width="226" height="170">

हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने छह दिसंबर, 1992 को विवादित ढाँचा गिरा दिया था

जनवरी 2002: अयोध्या विवाद सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अयोध्या समिति का गठन किया. वरिष्ठ अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को हिंदू और मुसलमान नेताओं के साथ बातचीत के लिए नियुक्त किया गया.

फ़रवरी 2002: भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अपने घोषणापत्र में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को शामिल करने से इनकार कर दिया. विश्व हिंदू परिषद ने 15 मार्च से राम मंदिर निर्माण कार्य शुरु करने की घोषणा कर दी. सैकड़ों हिंदू कार्यकर्ता अयोध्या में इकठ्ठा हुए. अयोध्या से लौट रहे हिंदू कार्यकर्ता जिस रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे उस पर गोधरा में हुए हमले में 58 कार्यकर्ता मारे गए.

13 मार्च, 2002: सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फ़ैसले में कहा कि अयोध्या में यथास्थिति बरक़रार रखी जाएगी और किसी को भी सरकार द्वारा अधिग्रहीत ज़मीन पर शिलापूजन की अनुमति नहीं होगी. केंद्र सरकार ने कहा कि अदालत के फ़ैसले का पालन किया जाएगा.

15 मार्च, 2002: विश्व हिंदू परिषद और केंद्र सरकार के बीच इस बात को लेकर समझौता हुआ कि विहिप के नेता सरकार को मंदिर परिसर से बाहर शिलाएं सौंपेंगे. रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत परमहंस रामचंद्र दास और विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक सिंघल के नेतृत्व में लगभग आठ सौ कार्यकर्ताओं ने सरकारी अधिकारी को अखाड़े में शिलाएं सौंपीं.

22 जून, 2002: विश्व हिंदू परिषद ने मंदिर निर्माण के लिए विवादित भूमि के हस्तांतरण की माँग उठाई.

जनवरी 2003: रेडियो तरंगों के ज़रिए ये पता लगाने की कोशिश की गई कि क्या विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद परिसर के नीचे किसी प्राचीन इमारत के अवशेष दबे हैं, कोई पक्का निष्कर्ष नहीं निकला.

मार्च 2003: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से विवादित स्थल पर पूजापाठ की अनुमति देने का अनुरोध किया जिसे ठुकरा दिया गया.

अप्रैल 2003: इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्देश पर पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने विवादित स्थल की खुदाई शुरू की, जून महीने तक खुदाई चलने के बाद आई रिपोर्ट में कहा गया है कि उसमें मंदिर से मिलते जुलते अवशेष मिले हैं.

मई 2003: सीबीआई ने 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी सहित आठ लोगों के ख़िलाफ पूरक आरोपपत्र दाखिल किए.

जून 2003: काँची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की और उम्मीद जताई कि जुलाई तक अयोध्या मुद्दे का हल निश्चित रूप से निकाल लिया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

<span title=आडवाणी" width="226" height="170">

हाईकोर्ट ने आडवाणी पर आपराधिक मुक़दमा चलाने की अनुमति नहीं दी है

अगस्त 2003: भाजपा नेता और उप प्रधानमंत्री ने विहिप के इस अनुरोध को ठुकराया कि राम मंदिर बनाने के लिए विशेष विधेयक लाया जाए.

अप्रैल 2004: आडवाणी ने अयोध्या में अस्थायी राममंदिर में पूजा की और कहा कि मंदिर का निर्माण ज़रूर किया जाएगा.

जुलाई 2004: शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे ने सुझाव दिया कि अयोध्या में विवादित स्थल पर मंगल पांडे के नाम पर कोई राष्ट्रीय स्मारक बना दिया जाए.

जनवरी 2005: लालकृष्ण आडवाणी को अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस में उनकी कथित भूमिका के मामले में अदालत में तलब किया गया.

जुलाई 2005: पाँच हथियारबंद चरमपंथियों ने विवादित परिसर पर हमला किया जिसमें पाँचों चरमपंथियों सहित छह लोग मारे गए, हमलावर बाहरी सुरक्षा घेरे के नज़दीक ही मार डाले गए.

06 जुलाई 2005 : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के दौरान 'भड़काऊ भाषण' देने के मामले में लालकृष्ण आडवाणी को भी शामिल करने का आदेश दिया. इससे पहले उन्हें बरी कर दिया गया था.

28 जुलाई 2005 : लालकृष्ण आडवाणी 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में गुरूवार को रायबरेली की एक अदालत में पेश हुए. अदालत ने लालकृष्ण आडवाणी के ख़िलाफ़ आरोप तय किए.

04 अगस्त 2005: फ़ैजाबाद की अदालत ने अयोध्या के विवादित परिसर के पास हुए हमले में कथित रूप से शामिल चार लोगों को न्यायिक हिरासत में भेजा.

<span title=न्यायमूर्ति लिब्रहान और चिदंबरम" width="226" height="170">

लिब्रहान आयोग ने 17 सालों बाद अपनी रिपोर्ट सौंप दी है

20 अप्रैल 2006 : कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार ने लिब्रहान आयोग के समक्ष लिखित बयान में आरोप लगाया कि बाबरी मस्जिद को ढहाया जाना सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा था और इसमें भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, बजरंग दल और शिव सेना की 'मिलीभगत' थी.

जुलाई 2006 : सरकार ने अयोध्या में विवादित स्थल पर बने अस्थाई राम मंदिर की सुरक्षा के लिए बुलेटप्रूफ़ काँच का घेरा बनाए जाने का प्रस्ताव किया. इस प्रस्ताव का मुस्लिम समुदाय ने विरोध किया और कहा कि यह अदालत के उस आदेश के ख़िलाफ़ है जिसमें यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए गए थे.

19 मार्च 2007 : कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने चुनावी दौरे के बीच कहा कि अगर नेहरू-गाँधी परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद न गिरी होती. उनके इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया हुई.

30 जून 2009: बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले की जाँच के लिए गठित लिब्रहान आयोग ने 17 वर्षों के बाद अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी.

सात जुलाई, 2009: उत्तरप्रदेश सरकार ने एक हलफ़नामे में स्वीकार किया कि अयोध्या विवाद से जुड़ी 23 महत्वपूर्ण फ़ाइलें सचिवालय से ग़ायब हो गई हैं.

24 नवंबर, 2009: लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश. आयोग ने अटल बिहारी वाजपेयी और मीडिया को दोषी ठहराया और नरसिंह राव को क्लीन चिट दी.

20 मई, 2010: बाबरी विध्वंस के मामले में लालकृष्ण आडवाणी और अन्य नेताओं के ख़िलाफ़ आपराधिक मुक़दमा चलाने को लेकर दायर पुनरीक्षण याचिका हाईकोर्ट में ख़ारिज.

26 जुलाई, 2010: रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद पर सुनवाई पूरी.

8 सितंबर, 2010: अदालत ने अयोध्या विवाद पर 24 सितंबर को फ़ैसला सुनाने की घोषणा की.

17 सितंबर, 2010: हाईकोर्ट ने फ़ैसला टालने की अर्जी ख़ारिज की।

अयोध्या के मुक़दमे

अयोध्या में विवादित भूमि

एक मुक़दमा पिछले 55 वर्षों से विचाराधीन है

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में मुख्य रूप से दो तरह के मामले अदालतों में विचाराधीन हैं और एक आयोग इस मामले की जाँच कर रहा है.

इनमें पहली क़िस्म के पाँच मुकदमे उस ज़मीन के मालिकाना हक़ के लिए हैं जिस पर 1992 तक बाबरी मस्जिद बनी हुई थी.

ऐसा एक मुक़दमा तो पिछले 55 वर्षों से विचाराधीन है.

विवादित स्थल के मालिकाना हक़ के लिए चल रहे सारे मुक़दमे इस समय इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के पास एक साथ विचाराधीन है.

दूसरे मुक़दमे मस्जिद गिराने के लिए षडयंत्र रचने और इसके लिए लोगों को उकसाने के आपराधिक मुक़दमे हैं.

ये मामले लखनऊ और रायबरेली की विशेष अदालतों में चल रहे हैं.

विवाद की शुरुआत

वैसे तो बाबरी मस्जिद पर मालिकाना हक़ का मामला तो सौ बरस से भी अधिक पुराना है. लेकिन यह अदालत पहुँचा 1949 में.

यह विवाद 23 दिसंबर 1949 को शुरू हुआ जब सवेरे बाबरी मस्जिद का दरवाज़ा खोलने पर पाया गया कि उसके भीतर हिंदुओं के आराध्य देव राम के बाल रूप की मूर्ति रखी थी.

इस जगह हिंदुओं के आराध्य राम की जन्मभूमि होने का दावा करने वाले हिंदू कट्टरपंथियों ने कहा था कि "रामलला यहाँ प्रकट हुए हैं."

लेकिन मुसलमानों का आरोप है कि रात में किसी ने चुपचाप बाबरी मस्जिद में घुसकर ये मूर्ति वहां रख दी थी.

मुसलमानों का कहना है कि ऐसे कोई सबूत नहीं हैं कि वहाँ कभी मंदिर था.

सरकारी रिपोर्ट

9 अगस्त 1991 को भारतीय संसद में पेश की गई जानकारी के अनुसार फ़ैज़ाबाद के तत्कालीन ज़िलाधिकारी केके नैयर ने घटना की जो रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी थी उसमें लिखा था, "रात में जब मस्जिद में कोई नहीं था तब कुछ हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद में घुसकर वहाँ एक मूर्ति रख दी."

अगले दिन वहां हज़ारों लोगों की भीड़ जमा हो गई और पाँच जनवरी 1950 को जिलाधिकारी ने सांप्रदायिक तनाव की आशंका से बाबरी मस्जिद को विवादित इमारत घोषित कर दिया और उस पर ताला लगाकर इसे सरकारी कब्ज़े में ले लिया.

16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद ने फैज़ाबाद की ज़िला अदालत में अर्ज़ी दी कि हिंदुओं को उनके भगवान के दर्शन और पूजा का अधिकार दिया जाए.

दिगंबर अखाड़ा के महंत और इस वक्त राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष परमहंस रामचंद्र दास ने भी ऐसी ही एक अर्ज़ी दी.

पूजा शुरू

19 जनवरी 1950 को फ़ैजाबाद के सिविल जज ने इन दोनों अर्ज़ियों पर एक साथ सुनवाई की और मूर्तियां हटाने की कोशिशों पर रोक लगाने के साथ साथ इन मूर्तियों के रखरखाव और हिंदुओं को बंद दरवाज़े के बाहर से ही इन मूर्तियों के दर्शन करने की इजाज़त दे दी.

साथ ही, अदालत ने मुसलमानों पर पाबंदी लगा दी कि वे इस 'विवादित मस्जिद' के तीन सौ मीटर के दायरे में न आएँ.

बाबरी मस्जिद

उमेश चंद्र पांडे की एक याचिका पर फ़ैज़ाबाद के ज़िला जज के एम पांडे ने एक फ़रवरी 1986 को विवादित मस्जिद के ताले खोलने का आदेश दिया और हिंदुओं को उसके भीतर जाकर पूजा करने की इजाज़त दे दी.

11 नवंबर 1986 को विश्व हिंदू परिषद ने विवादित मस्जिद के पास की ज़मीन पर गड्ढे खोदकर शिला पूजन किया.

1987 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में एक याचिका दायर की कि विवादित मस्जिद के मालिकाना हक़ के लिए ज़िला अदालत में चल रहे चार अलग अलग मुक़दमों को एक साथ जोड़कर उच्च न्यायालय में उनकी एक साथ सुनवाई की जाए.

इस अर्ज़ी पर विचार चल ही रहा था कि 1989 में अयोध्या की ज़िला अदालत में एक याचिका दायर कर मांग की गई कि विवादित मस्जिद को मंदिर घोषित किया जाए.

उच्च न्यायालय ने पाँचों मुक़दमों को साथ जोड़कर तीन जजों की एक बेंच को सौंप दिया.

इसके बाद 10 नवंबर 1989 को अयोध्या में मंदिर का शिलान्यास हुआ लेकिन अगले ही दिन फ़ैज़ाबाद के ज़िलाधीश ने आगे निर्माण पर रोक लगा दी.

1993 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने विवादित स्थल के आसपास की 67 एकड़ ज़मीन को सरकारी क़ब्ज़े में लेकर उसे विश्व हिंदू परिषद को सौंप दिया था.

सरकार ने उस समय कहा था कि इस पूरी ज़मीन पर पर्यटन के लिए एक रामकथा पार्क विकसित किया जाएगा जिसकी ज़िम्मेदारी विश्व हिंदू परिषद को सौंपी गई थी.

1994 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस फ़ैसले को निरस्त कर सरकार को आदेश दिया था कि अयोध्या में विवादित ढांचे के आसपास की यह ज़मीन दोबारा अधिगृहीत की जाए और उस पर तब तक यथास्थिति बनाकर रखी जाए जब तक अदालत विवादित ढांचे की ज़मीन के मालिकाना हक़ का फ़ैसला न कर दे.

सर्वोच्च न्यायालय ने उस वक्त कहा था कि मालिकाना हक का फ़ैसला होने से पहले इस ज़मीन के अविवादित हिस्सों को भी किसी एक समुदाय को सौंपना "धर्मनिरपेक्षता की भावना" के अनुकूल नहीं होगा.

मस्जिद ध्वस्त

आडवाणी

लालकृष्ण आडवाणी सहित आठ लोगों पर बाबरी मस्जिद गिराए जाने का षडयंत्र रचने का आरोप है

6 दिसंबर 1992 को भारतीय जनता पार्टी, शिवसेना, विश्वहिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया.

बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बारे में दो अलग-अलग मामलों की सुनवाई लखनऊ और रायबरेली में दो विशेष अदालतों में चल रही है.

पहले इस मामले में आडवाणी सहित 49 लोगों के ख़िलाफ़ लखनऊ में मुकदमा चल रहा था.

लेकिन उच्च न्यायालय ने आठ शीर्ष हिंदू राष्ट्रवादी नेताओं से संबंधित मामले को अलग कर दिया.

इसके बाद से इन आठ नेताओं के मामले की सुनवाई रायबरेली में हो रही है. रायबरेली की अदालत में चल रहा मुक़दमा मुख्यरुप से मस्जिद गिराने के षडयंत्र का मुक़दमा है.

मई 2003 को सीबीआई ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, साध्वी रितम्भरा, विष्णु हरि डालमिया, अशोक सिंघल और गिरिराज़ किशोर सहित आठ लोगों के ख़िलाफ़ पूरक आरोप पत्र दाखिल किए.

2003 में रायबरेली की अदालत ने आडवाणी को सभी आरोपों से बरी कर दिया था. लेकिन अदालत के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ मुस्लिम समुदाय के लोगों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.

हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 6 जुलाई 2003 को आडवाणी और अन्य नेताओं के ख़िलाफ़ मुक़दमा फिर से शुरू करने का आदेश दिया.

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका असलम भूरे ने दाखिल की थी कि जब बाबरी मस्जिद का मामला लखनऊ की अदालत में चल रहा है तो रायबरेली वाले मामले भी वहीं स्थानांतरित कर दिए जाएँ.

लेकिन 22 मार्च 2007 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा है कि मुक़दमा रायबरेली की अदालत में ही चलेगा.

लिब्रहान आयोग

इन मुक़दमों के अलावा बाबरी मस्जिद गिराए जाने को लेकर एक आयोग भी जाँच कर रहा है.

इस आयोग का गठन बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद 16 दिसंबर 1992 को किया गया था. कहा गया था कि यह आयोग तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट दे देगा.

लेकिन आयोग का कार्यकाल बढ़ता रहा और 14 वर्ष बीत जाने के बाद भी इसकी रिपोर्ट नहीं आई है.

हालांकि जून 2006 ने आयोग ने अपनी सुनवाई पूरी कर ली है.

आयोग ने पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव, पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों कल्याण सिंह और मुलायम सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी सहित बहुत से नेताओं के बयान दर्ज किए हैं।

तीन हिस्सों में बंटवारा'


न्यायलय को दिया गया अयोध्या स्थल का नक्शा

न्यायालय को दिए गए अयोध्या स्थल के नक्शे में बंटवारे वाले हिस्से देखे जा सकते हैं

एक ऐतिहासिक फ़ैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने अयोध्या के विवादित स्थल को राम जन्मभूमि घोषित किया है.

हाईकोर्ट ने बहुमत से फ़ैसला किया है कि विवादित भूमि जिसे रामजन्मभूमि माना जाता रहा है, उसे हिंदू गुटों को दे दिया जाए. वहाँ से रामलला की प्रतिमा को नहीं हटाया जाएगा.

क्लिक करें फ़ैसले के बाद संयम, खुशी और निराशा

लेकिन अदालत ने यह भी पाया कि चूंकि कुछ हिस्सों पर, जिसमें सीता रसोई और राम चबूतरा शामिल है, निर्मोही अखाड़े का भी कब्ज़ा रहा है इसलिए यह हिस्सा निर्माही अखाड़े के पास ही रहेगा.

मैं इस फ़ैसले का इस्तक़बाल करता हूं और इस फ़ैसले से बाबरी मस्जिद के नाम पर चल रहा राजनीतिक अखाड़ा बंद होगा

90-वर्षीय याचिकाकर्ता हाशिम अंसारी

अदालत के दो जजों ने यह फ़ैसला भी दिया है कि इस भूमि के कुछ हिस्सों पर मुसलमान प्रार्थना करते रहे हैं इसलिए ज़मीन का एक तिहाई हिस्सा मुसलमान गुटों दे दिया जाए.

तीन जजों की पूर्ण विशेष पीठ का यह पूरा फैसला लगभग दस हज़ार पन्नों का है.

वक्फ़ बोर्ड को एक तिहाई हिस्सा

तीनों जजों ने मुसलमानों के सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ़ बोर्ड के अपने दावे को कानूनन समय सीमा की मियाद बाहर होने के तकनीकी आधार पर ख़ारिज कर दिया है.

फिर भी दो जजों न्यायमूर्ति एस यू खान और न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने बहुमत से भगवान सिंह विशारद के मुक़दमे में प्रतिवादी के नाते सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को एक तिहाई हिस्से का हक़दार माना है.

क्लिक करें न्यायिक फ़ैसले का पाकिस्तान में विरोध

जजों ने माना है कि विवादित मस्जिद के अंदर भगवान राम की मूर्तियां 22/23 दिसंबर 1949 को रखी गई. यह भी माना है कि मस्जिद का निर्माण बाबर अथवा उसके आदेश पर किया गया और यह जगह भगवान राम का जन्म स्थान है .

अदालत ने यह भी माना है किस भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई में वहाँ एक विशाल प्राचीन मदिर के अवशेष मिले हैं , जिसके खंडहर पर मस्जिद बनी. लेकिन तीनों जजों में इस पर मतभेद है कि मस्जिद बनाते समय पुराना मंदिर तोड़ा गया.

लखनऊ में ख़ुशियाँ मनाते कुछ धार्मिक नेता

भारत ने अनेक धार्मिक और राजनीतिक संगठनों ने सतर्कतापूर्ण प्रतिक्रिया ज़ाहिर की है

जमीन बंटवारे में सहूलियत के लिए केंद्र सरकार द्वारा अधिग्रहीत 70 एकड़ ज़मीन को शामिल किया जाएगा.

ज़मीन बंटवारे के लिए मुक़दमे के सभी पक्षकारों से सुझाव मांगे गए हैं, जिसके बाद अदालत फाइनल डिक्री बनाएगी. इस बीच विवादित स्थल पर यथास्थिति बनी रहेगी.

इस बीच सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की बात भी कही है.

क्लिक करें शरारती तत्वों, अफ़वाहों से सावधान रहें: मनमोहन सिंह

फ़ैसले के बाद उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है.

उनका कहना था कि विवादित 67 एकड़ ज़मीन केंद्र सरकार के क़ब्ज़े में है इसलिए इस फ़ैसले के क्रियान्यवन की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की ही है.

उनका कहना था, "इसके लिए मैने फ़ैसला आने के बाद प्रधानमंत्री को पत्र लिख दिया है."

'विजय या पराजय के रूप में न देखें'

फ़ैसले के बाद इस विवाद के पहले याचिकाकर्ता, 90 साल के हाशिम अंसारी ने कहा: "मैं इस फ़ैसले का इस्तक़बाल करता हूं और इस फ़ैसले से बाबरी मस्जिद के नाम पर चल रहा राजनीतिक अखाड़ा बंद होगा."

फ़ैसले पर मायूस होने की ज़रूरत नहीं है और सड़कों पर उतरने की ज़रूरत नहीं है. दो जजों ने माना है कि वहां मस्जिद थी लेकिन उसके बनने के तरीके पर सवाल उठाए गए हैं और इसलिए हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे

ज़फ़रयाब जीलानी, वक्फ़ बोर्ड के वकील

उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने फ़ैसले का स्वागत किया लेकिन साथ ही कहा कि अगर ज़मीन का बंटवारा नहीं होता तो अच्छा होता.

उनका कहना था, "मेरे अनुसार अदालत ने ये ज़मीन मुस्लिम वक्फ़ बोर्ड को दान में दिया है."

फ़ैसले के दिन लखनऊ की तस्वीरें

वहीं मुस्लिम वक्फ़ बोर्ड के वकील जफ़रयाब जिलानी ने कहा है कि वो इस फ़ैसले से "कुछ हद तक निराश हैं". उन्होंने कहा कि फ़ैसले का अच्छी तरह से अध्ययन करने के बाद वो सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगे.

उनका कहना था, "फ़ैसले पर मायूस होने की ज़रूरत नहीं है और सड़कों पर उतरने की ज़रूरत नहीं है. दो जजों ने माना है कि वहां मस्जिद थी लेकिन उसके बनने के तरीके पर सवाल उठाए गए हैं और इसलिए हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे."

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने कहा है कि इस फ़ैसले को किसी के विजय या पराजय के रुप में नहीं देखा जाना चाहिए.

उनका कहना है कि अब राष्ट्रीय मूल्यों के प्रतीक के रुप में राम मंदिर का निर्माण होना चाहिए न कि किसी देवी-देवता के प्रतीक के रुप में.

विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया का कहना है कि देश के सौ करोड़ हिंदुओं की श्रद्धा रही है और इस फ़ैसले से इस श्रद्धा का सम्मान हुआ है.

अयोध्या फ़ैसले पर बीजेपी की प्रतिक्रिया

जबकि विश्व हिंदू परिषद के ही एक अन्य नेता गिरिराज किशोर ने कहा है कि अब मुसलमानों को गुड-विल का परिचय देते हुए मथुरा और काशी को भी हिंदुओं को सौंप देना चाहिए.

शांति की अपील

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी चिदंबरम ने सभी पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील की है.

क्लिक करें फ़ैसले में हक़ की तलाश: विश्लेषण

सुरक्षा व्यवस्था भी काफ़ी कड़ी रखी गई है. ये फ़ैसला पहले 24 सितंबर को आना था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे रोकने के लिए दाखिल याचिका पर सुनवाई की और फ़ैसला टाल दिया. फिर 28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को खारिज करते हुए फ़ैसले के लिए 30 सितंबर की तारीख़ तय कर दी.

इस मामले की सुनवाई कर रही तीन जजों की बेंच में से एक, धर्मवीर शर्मा, एक अक्तूबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं और यदि वो फ़ैसला उससे पहले नहीं सुना पाते तो पूरे मामले की सुनवाई फिर से करनी पड़ती.

अयोध्या में विवादित जमीन के मालिकाना हक के चार मामलों की सुनवाई करने वाली हाईकोर्ट की विशेष पीठ पिछले 21 साल में 13 बार बदल चुकी है.

बेंच में यह बदलाव जजों के रिटायर होने, पदोन्नति या तबादले के कारण करने पड़े.

भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में यह न केवल साठ साल तक यानि सबसे लंबा चलने वाला, बल्कि एक ऐसा विवाद है, जिसके चलते देश में कई बार राजनीतिक और सामाजिक उथल - पुथल हो चुकी है, क्योंकि यह मामला ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े नहीं बल्कि हिंदू–मुस्लिम दोनों समुदायों की धार्मिक आस्थाओं और संविधान के मूल सिद्धांतों से जुड़ा है.

अयोध्या के बाद विभिन्न समुदायों की प्रतिक्रियाएँ


साभार - बीबीसी

No comments:

Post a Comment