Sunday, September 18, 2011

विश्व कप फ़ुटबॉल अब तक

ऐसे हुई शुरुवात -

दुनियाभर से मिलने वाले अपार समर्थन के बीच विश्व कप फ़ुटबॉल आज प्रतिष्ठित,रोमांचक और लोकप्रिय खेल प्रतियोगिताओं में शीर्ष पर है. इसकी नींव 1930 में पड़ी थी, जब अपनी आज़ादी की सौवीं वर्षगाँठ मना रहे उरुग्वे को इसकी मेज़बानी सौंपी गई.

दरअसल फ़ीफ़ा ने वर्ष 1914 में यह फ़ैसला किया था कि ओलंपिक के दौरान होने वाली फ़ुटबॉल प्रतियोगिता वर्ल्ड फ़ुटबॉल चैम्पियनशिप का दर्जा मिले. वर्ष 1920 से लेकर 1928 तक ये प्रतियोगिता आयोजित भी हुई.

लेकिन 1932 के लॉस एंजेलेस ओलंपिक के दौरान फ़ुटबॉल चैम्पियनशिप में खिलाड़ियों की स्थिति को लेकर असहमति हुई और ओलंपिक के शुरुआती कार्यक्रम में फ़ुटबॉल को शामिल नहीं किया गया.

इसी के बाद ओलंपिक से अलग फ़ुटबॉल चैम्पियनशिप कराने की क़वायद शुरू हुई और फिर जन्म हुआ विश्व कप फ़ुटबॉल का.

वर्ष 1930 में उरुग्वे को विश्व कप फ़ुटबॉल की मेज़बानी मिली. उस समय उरुग्वे की टीम ओलंपिक चैम्पियन थी. यह पहला विश्व कप था, जिसमें देशों को बिना क्वालीफ़ाइंग राउंड खेले ही शामिल होने का न्यौता मिला.

लेकिन कई देशों ने आने-जाने में आने वाले भारी-भरकम ख़र्च को देखते हुए अपने को इस प्रतियोगिता से दूर रखा. फिर भी इस प्रतियोगिता में 13 देशों ने हिस्सा लिया.

मैच

लेकिन यूरोप के सिर्फ़ चार देश ही प्रतियोगिता में खेलने आए. ये देश थे- फ़्रांस, बेल्जियम, यूगोस्लाविया और रोमानिया. इन 13 टीमों को चार अलग-अलग ग्रुपों में रखा गया. विश्व कप का पहला मैच 13 जुलाई, 1930 को फ़्रांस और मैक्सिको के बीच खेला गया.

विश्व कप 1930

उरुग्वे की टीम को मिला ख़िताब

इस मैच को देखने के लिए कुछ हज़ार दर्शक ही मौजूद थे. जीत मिली फ़्रांस को, जिसने मैक्सिको को 4-1 से मात दी. लेकिन आख़िरकार युगोस्लाविया के अलावा कोई भी यूरोपीय टीम दूसरे ग्रुप चरण में नहीं पहुँच पाईं.

सेमी फ़ाइनल में उरुग्वे का मुक़ाबला यूगोस्लाविया से और अर्जेंटीना का मुक़ाबला अमरीका से हुआ. इस प्रतियोगिता में सेमी फ़ाइनल के पहले तक शानदार प्रदर्शन करने वाली यूगोस्लाविया की टीम सेमी फ़ाइनल में मेजबान उरुग्वे से 1-6 से हार गई.

जबकि अर्जेंटीना ने अमरीका को इतने ही अंतर से पीटा.

30 जुलाई को पहले विश्व कप का फ़ाइनल उरुग्वे और अर्जेंटीना के बीच खेला गया. मैच रोमांचक था और दोनों टीमों के बीच संघर्ष देखते ही बन रहा था. पहले फ़ाइनल को क़रीब 93 हज़ार लोगों ने देखा. हाफ़ टाइम तक अर्जेंटीना की टीम 2-1 से आगे थी.

लेकिन दूसरे हाफ़ में एक के बाद एक तीन गोल करके उरुग्वे ने 4-2 से जीत हासिल की और पहले विश्व कप का ख़िताब जीतने में क़ामयाबी पाई।

1934 में फ़ुटबॉल विश्व कप

1934 में फ़ुटबॉल विश्व कप की मेजबानी मिली इटली को. मेजबानी की दौड़ में इटली और स्वीडन ही शामिल थे और मौक़ा मिला इटली को.

लेकिन फ़ीफ़ा के इस फ़ैसले पर आश्चर्य भी व्यक्त किया गया क्योंकि उस समय इटली की बागडोर थी मुसोलिनी के हाथों में.

यहाँ तक कहा गया कि मुसोलिनी ने विश्व कप को अपने प्रचार-प्रसार के लिए इस्तेमाल किया. आरोप तो यहाँ तक लगाए जाते हैं कि इटली के मैचों में रेफ़री तक मुसोलिनी के कहने पर नियुक्त हुए.

कहा तो यहाँ तक जाता है कि स्वीडन के जिस रेफ़री ने सेमी फ़ाइनल और फ़ाइनल मैच कराया था, उसने पहले मुसोलिनी से मुलाक़ात की थी. कुछ रेफ़री ने तो इटली के पक्ष में इतने फ़ैसले दिए कि बाद में उनके देशों ने उन्हें हटा दिया.

विवादों की छाया में हुए इस विश्व कप में ऐसा पहली बार हुआ कि पिछली चैम्पियन टीम ने प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं लिया.

उरुग्वे ने यह कहते हुए इटली आने से इनकार कर दिया कि पिछले विश्व कप में कम ही यूरोपीय देशों ने हिस्सा लिया था.

क्वालीफ़ाइंग राउंड

यह पहला विश्व कप था, जिसमें टीमों को हिस्सा लेने के लिए क्वालीफ़ाइंग राउंड खेलना पड़ा. मेजबान इटली भी इसमें शामिल था.

कुल मिलाकर 16 टीमें इस प्रतियोगिता में खेलीं. इस विश्व कप में पहले राउंड से नॉक आउट स्टेज तक यूरोप की आठ टीमें पहुँचीं. ये टीमें थीं- ऑस्ट्रिया, चेकोस्लोवाकिया, जर्मनी, हंगरी, इटली, स्पेन, स्वीडन और स्विट्ज़रलैंड.

क्वार्टर फ़ाइनल में पहली बार ऐसा हुआ जब मैच दोबारा खेला गया. इटली और स्पेन के बीच मैच अतिरिक्त समय तक खिंचा, लेकिन स्कोर रहा 1-1. मैच दोबारा खेला गया और इटली ने स्पेन को 1-0 से हरा दिया.

सेमी फ़ाइनल में मेजबान इटली ने ऑस्ट्रिया को 1-0 से हराकर फ़ाइनल में जगह बनाई. जबकि दूसरे सेमी फ़ाइनल में चेकोस्लोवाकिया ने जर्मनी को 3-1 से हराया.

फ़ाइनल में 70 मिनट तक चेकोस्लोवाकिया की टीम 1-0 से आगे थी. लेकिन मैच ख़त्म होने से पहले किसी तरह इटली की टीम एक गोल करने में सफल रही.

मैच 1-1 से बराबर हो गया। इसके बाद फ़ाइनल अतिरिक्त समय में गया, जहाँ इटली की टीम ने गोल करके ख़िताब पर क़ब्ज़ा कर दिया.

1938 का विश्व कप

1938 का विश्व कप

1938 की विश्व कप की मेजबानी मिली फ़्रांस को. यह लगातार दूसरी बार था, जब विश्व कप की मेजबानी किसी यूरोपीय देश को मिली.

लेकिन फ़ीफ़ा के इस फ़ैसले से दक्षिणी अमरीकी देश काफ़ी नाराज़ हुए. उनकी मांग थी कि विश्व कप बारी-बारी से यूरोप और दक्षिणी अमरीकी देशों को मिले. इस फ़ैसले के विरोध में अर्जेंटीना और उरुग्वे ने प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं लिया.

दूसरे विश्व युद्ध की छाया में इस बार का विश्व कप हो रहा था. स्पेन में गृह युद्ध चल रहा था, इटली ने इथियोपिया पर आक्रमण कर दिया था और जर्मनी ने ऑस्ट्रिया को अपने में मिला लिया था.

माना जाता है कि जिस तरह 1936 के विश्व कप का इस्तेमाल मुसोलिनी ने अपने प्रचार-प्रसार के लिए किया, उसी तरह हिटलर ने 1938 के विश्व कप का इस्तेमाल किया.

यह पहला मौक़ा था, जब मेजबान देश और पिछली विजेता टीम को विश्व कप में सीधे प्रवेश मिला. इस बार विश्व कप में 15 टीमों ने हिस्सा लिया.

पहले दौर के पाँच मैचों का फ़ैसला अतिरिक्त समय में हुआ जबकि दो मैच दोबारा खेले गए. इस प्रतियोगिता में ब्राज़ील के लियोनिडस का खेल देखने लायक़ था. 'द ब्लैक डायमंड' के रूप में मशहूर लियोनिडस ने कई बेहतरीन गोल दाग़े.

वापसी

लेकिन सेमी फ़ाइनल में उन्हें आराम देने का टीम प्रबंधन का फ़ैसला आत्मघाती साबित हुआ. लियोनिडस की अनुपस्थिति में ब्राज़ील की टीम सेमी फ़ाइनल में इटली से हार गई. जबकि दूसरे सेमी फ़ाइनल में हंगरी ने स्वीडन को 5-1 से पीटा.

तीसरे स्थान के लिए हुए मैच में लियोनिडस की ब्राज़ील की ओर से वापसी हुई और ब्राज़ील की शानदार जीत भी हुई. ब्राज़ील को तीसरे स्थान से ही संतोष करना पड़ा.

फ़ाइनल में इटली का सामना था हंगरी से. जिसके खिलाड़ी कमोबेश उनकी तरह की फ़ुटबॉल खेलते थे.पेरिस में हुए इस मैच में इटली ने पहले बढ़त हासिल की लेकिन जल्द ही हंगरी से स्कोर बराबर कर दिया.

इटली ने जल्द ही एक बार फिर बढ़त हासिल कर ली. पहले हाफ़ की समाप्ति पर इटली की टीम 3-1 से आगे थी. आख़िरकार इटली ने 4-2 से जीत हासिल कर लगातार दूसरी बार विश्व कप जीतने वाली पहली टीम बनने का गौरव हासिल किया.

इस विश्व कप के 15 महीने के अंदर दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया और 12 साल तक यह प्रतियोगिता आयोजित नहीं हो पाई.

1950 का विश्व कप

विश्व कप पर विश्व युद्ध की छाया

दूसरे विश्व युद्ध के कारण 12 साल बाद फ़ीफ़ा ने विश्व कप आयोजित कराने का फ़ैसला किया. हालाँकि यूरोपीय देश अभी भी विश्व युद्ध के प्रभाव से जूझ रहे थे.

फ़ीफ़ा ने इस बार दक्षिणी अमरीकी देश को मेजबानी देने का फ़ैसला किया और वह सौभाग्यशाली देश था ब्राज़ील.

इस बार प्रतियोगिता के स्वरूप में थोड़ा बदलाव किया गया. पहले राउंड में टीमों को चार ग्रुप में रखा गया और ग्रुप की विजेताओं को फ़ाइनल ग्रुप में खेलने का मौक़ा मिला.

फ़ाइनल ग्रुप में खेलने वाली टीमों में शीर्ष टीम को ख़िताब दिया गया. इस आधार पर यह पहला और एकमात्र विश्व कप था, जिसमें फ़ाइनल मैच नहीं खेला गया. बल्कि अंक के आधार पर टीम को विजेता घोषित किया गया.

इस विश्व कप में ट्रॉफ़ी को नाम दिया गया ज़ूल्स रिमे कप. ज़ूल्स रिमे विश्व कप के संस्थापक थे और उस समय फ़ीफ़ा के अध्यक्ष थे.

इस वर्ष पहली बार विश्व कप में शामिल हुई इंग्लैंड की टीम. लेकिन अर्जेंटीना ने ब्राज़ील से मतभेद के कारण विश्व कप से नाम वापस ले लिया.

विश्व युद्ध का प्रभाव ये था कि फ़ीफ़ा ने जर्मनी को निकाल दिया जबकि ऑस्ट्रिया, इक्वेडोर और बेल्जियम की टीम भी विश्व कप में खेलने नहीं आईं.

कई टीमों की अनुपस्थिति में भारत की टीम भी पहली बार विश्व कप के लिए क्वालीफ़ाई कर गई. लेकिन नंगे पाँव होने के कारण फ़ीफ़ा ने भारतीय टीम को खेलने नहीं दिया.

पहली बार विश्व कप में खेल रही इंग्लैंड की टीम को ख़िताब का प्रबल दावेदार माना जा रहा था.

लेकिन ऐसा हुआ नहीं. पहले तो टीम को उस समय क़रारा झटका लगा, जब अमरीका ने इंग्लैंड को 1-0 से हरा दिया.

निर्णायक मुक़ाबला

इसे विश्व कप के सबसे उलटफेर में से एक माना जाता है. इंग्लैंड की टीम स्पेन से भी 1-0 से हारकर पहले दौर से ही बाहर हो गई. फ़ाइनल राउंड में उसे जाने का मौक़ा तक नहीं मिला.

उरुग्वे

उरुग्वे की टीम बनी फिर चैम्पियन

ग्रुप स्टेज से फ़ाइनल राउंड में पहुँचने वाली चार टीमें थीं- ब्राज़ील, स्पेन, स्वीडन और उरुग्वे. इस प्रतियोगिता में सबसे शानदार प्रदर्शन कर रही थी मेजबान ब्राज़ील की टीम.

फ़ाइनल राउंड की भी ब्राज़ील ने इसी अंदाज़ में शुरुआत की. उसने स्वीडन को 7-1 और स्पेन को 6-1 से मात दी.

निर्णायक मैच के पहले ब्राज़ील की टीम फ़ाइनल ग्रुप में शीर्ष पर थी. ब्राज़ील और उरुग्वे के बीच निर्णायक मैच देखने के लिए लाखों की संख्या में दर्शक जुटें.

ख़िताब की दावेदार मानी जा रही थी ब्राज़ील की टीम, लेकिन हुआ उल्टा। उरुग्वे ने ब्राज़ील को 2-1 से हराकर दूसरी बार विश्व कप के ख़िताब़ पर क़ब्ज़ा कर लिया।


1958 का विश्व कप

महान पेले का उदभव

1958 के विश्व कप की मेजबानी मिली स्वीडन को. पहली बार इस विश्व कप में सोवियत संघ ने हिस्सा लिया और पहली बार ही ग्रेट ब्रिटेन के सभी देशों- इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड, ने हिस्सा लिया.

इस बार प्रतियोगिता के स्वरूप में फिर थोड़ा बदलाव हुआ. 16 टीमों ने विश्व कप के लिए क्वालीफ़ाई किया.

लेकिन इस बार ये तय किया गया कि सभी टीमें अपने ग्रुप में कम से कम एक बार सभी टीमों से खेलेंगी.

इस बार ग्रुप मैच ड्रॉ होने की सूरत में अतिरिक्त समय देने का प्रावधान ख़त्म कर दिया गया. पहली बार विश्व कप के मैचों का सीधा प्रसारण टीवी पर हुआ.

इस विश्व कप की एक और ख़ासियत थी- ब्राज़ील के स्टार खिलाड़ी पेले का उदभव.

इस विश्व कप से अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले पेले ने अगले कई वर्षों तक फ़ुटबॉल की दुनिया में राज किया. इस विश्व कप में पेले ब्राज़ील के आख़िरी ग्रुप मैच से पहले तक नहीं खेल पाए थे.

सोवियत संघ के ख़िलाफ़ मैच में पेले को उतारा तो गया, लेकिन वे स्कोर कर पाने में नाकाम रहे. हालाँकि ब्राज़ील ने यह मैच 2-0 से जीत लिया.

इसी ग्रुप के एक प्ले ऑफ़ मैच में सोवियत संघ ने इंग्लैंड को हराकर प्रतियोगिता से बाहर कर दिया. मेजबान स्वीडन के कोच थे इंग्लैंड के जॉर्ज रेनॉर.

विजेता

उन्होंने पहले ही ये भविष्यवाणी कर दी थी कि उनकी टीम फ़ाइनल में ज़रूर पहुँचेगी. अपने पहले मैच में स्वीडन ने मैक्सिको को 3-0 से हराया.

पेले

इसके बाद हंगरी, सोवियत संघ और फिर सेमी फ़ाइनल में पश्चिम जर्मनी को हराकर स्वीडन ने फ़ाइनल में जगह बनाई.

दूसरे सेमी फ़ाइनल में ब्राज़ील की भिड़ंत हुई फ़्रांस से. दर्शकों को एक ज़बरदस्त मैच देखने को मिला.

पेले भी शानदार फ़ॉर्म में थे. उन्होंने हैट-ट्रिक लगाई और ब्राज़ील ने फ़्रांस को 5-2 से मात दी. फ़्रांस की ओर से दोनों गोल मारे ज़ुस्ट फ़ोन्टेन ने. जिन्होंने इस विश्व कप में कुल 13 गोल मारे, जो आज भी विश्व रिकॉर्ड है.

फ़ाइनल में ब्राज़ील और स्वीडन की टीमें आमने-सामने थी. चौथे मिनट में ही स्वीडन ने 1-0 की बढ़त हासिल कर ली.

पेले और वावा के दो-दो गोलों की बदौलत ब्राज़ील ने आख़िरकार 5-2 से जीत हासिल कर पहली बार विश्व कप के ख़िताब पर क़ब्ज़ा कर लिया।

1962 का विश्व कप

ब्राज़ील ने फिर दिखाया दम

लगातार दो बार यूरोप में विश्व कप आयोजित कराने के बाद फ़ीफ़ा ने 1962 में विश्व कप की मेजबानी दक्षिणी अमरीकी देश को देने का फ़ैसला किया.

यहाँ मुक़ाबला था अर्जेंटीना और चिली में. 1960 में चिली में ज़बरदस्त भूकंप आया था और हज़ारों लोग मारे गए थे. लेकिन चिली के उत्साह में कोई कमी नहीं थी.

चिली में फ़ुटबॉल एसोसिएशन के अध्यक्ष डिटबॉर्न की भावुक अपील का असर पड़ा और चिली को मेजबानी का मौक़ा मिला या यों कहें कि भूकंप के बाद स्टेडियम के निर्माण के साथ पुनर्निर्माण का काम शुरू हुआ.

चार साल पहले ख़िताब जीतने वाली ब्राज़ील की टीम इस बार भी ख़िताब की प्रबल दावेदार थी. ब्राज़ील की टीम में कोई ख़ास बदलाव नहीं हुआ था.

ये ज़रूर था कि पेले अब 21 साल के हो गए थे और उनकी प्रतिभा में दिनों-दिन निखार आ रहा था. उनके साथ गरिंचा जैसे खिलाड़ी भी ब्राज़ील की शोभा बढ़ा रहे थे.

अपने ग्रुप में ब्राज़ील का प्रदर्शन शुरू से ही शानदार रहा. लेकिन इसके लिए उसे क़ीमत भी चुकानी पड़ी. ब्राज़ील के पहले मैच से ही पेले ज़बरदस्त फ़ॉर्म में थे.

लेकिन चेकोस्लोवाकिया के ख़िलाफ़ मैच में पेले घायल हो गए. मैच तो ड्रॉ रहा लेकिन पेले के जांघ की मांसपेशियाँ खिंच गईं. पेले इसके बाद कोई मैच नहीं खेल पाए.

उनकी जगह एमारिल्डो को टीम में शामिल किया गया. एमारिल्डो ने अपने खेल से सबका ध्यान खींचा और उन्हें 'ह्वाइट पेले' तक कहा गया. साथ ही गरिंचा और वावा पर भी टीम की ज़िम्मेदारी आ पड़ी, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया भी.

प्रदर्शन

मेजबान चिली और इटली के बीच हुआ मैच काफ़ी चर्चित हुआ. लेकिन शानदार प्रदर्शन के कारण नहीं बल्कि मैदान में घटी घटनाओं के कारण.

खिलाड़ी एक-दूसरे से खूब उलझे. इटली के दो खिलाड़ियों को मैदान से बाहर भी किया गया, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ. मेजबान चिली ने यह मैच 2-0 से जीत तो लिया लेकिन सैंटियागो में हुआ यह मैच ग़लत कारणों से चर्चा में रहा.

क्वार्टर फ़ाइनल में मेजबान चिली ने सोवियत संघ को हराकर एक बड़ा उलटफेर किया. एक अन्य क्वार्टर फ़ाइनल मैच में गरिंचा के शानदार खेल की बदौलत ब्राज़ील ने इंग्लैंड को 3-1 से पीटा.

यूगोस्लाविया ने जर्मनी को हराया तो चेकोस्लोवाकिया ने हंगरी को प्रतियोगिता से बाहर किया. सेमी फ़ाइनल में चेकोस्लोवाकिया ने यूगोस्लाविया को 3-1 से मात दी तो ब्राज़ील ने मेजबान चिली को 4-2 से हराकर लगातार फ़ाइनल में जगह बनाई.

फ़ाइनल में ब्राज़ील और चेकोस्लोवाकिया आमने-सामने थे. एक बार फिर ब्राज़ील की टीम 1-0 से पिछड़ गई.

लेकिन उन्होंने मैच में फिर वापसी की। ब्राज़ील ने तीन गोल करके मैच 3-1 से जीत लिया और लगातार दूसरी बार विश्व कप का ख़िताब अपने नाम किया वो भी अपने स्टार खिलाड़ी पेले की अनुपस्थिति में.

1970 का विश्व कप

फिर ब्राज़ील बना चैम्पियन

1970 में मैक्सिको में हुआ विश्व कप पहला विश्व कप था जब मैचों का रंगीन टेलीविज़न पर प्रसारण हुआ. इस विश्व कप के मैचों में खिलाड़ियों ने भी रंगीन पोशाकें पहनीं.

मैक्सिको विश्व कप को मेज़बानी के लिहाज़ से भी बेहतरीन माना जाता है. साथ ही ब्राज़ील की टीम का असाधारण प्रदर्शन भी इस विश्व कप को यादगार बना गया.

हालाँकि 1966 के विश्व कप में बुरा अनुभव लेकर गए पेले ने घोषणा की थी कि वे अब फिर विश्व कप में नहीं खेलेंगे.

लेकिन ब्राज़ील ने इस विश्व कप को काफ़ी गंभीरता से लिया. पेले भी अपना वनवास छोड़कर वापस आए और स्टार खिलाड़ियों की जमात में शामिल हुए.

ग्रुप मुक़ाबले में ब्राज़ील का मुक़ाबला इंग्लैंड से हुआ. मैच बड़ा शानदार रहा. आख़िरकार ब्राज़ील की टीम जीती लेकिन मैच यादगार रहा इंग्लैंड के गोलकीपर के शानदार प्रदर्शन के कारण जिन्होंने कई गोल बचाए.

इस हार के बावजूद इंग्लैंड की टीम ब्राज़ील के साथ नॉक आउट स्टेज तक पहुँच गई. क्वार्टर फ़ाइनल मैच में इटली ने मेज़बान मैक्सिको को 4-1 से पीटा, तो ब्राज़ील ने पेरू को 4-2 से मात दी.

उरुग्वे ने सोवियत संघ की सशक्त टीम को पछाड़ा. लेकिन सबसे ज़ोरदार मैच हुआ पश्चिम जर्मनी और इंग्लैंड के बीच. पश्चिम जर्मनी की टीम तो बदला लेने की कोशिश में थी ही. लेकिन इंग्लैंड ने शानदार शुरुआत की और 2-0 की बढ़त ले ली.

फ़ाइनल मुक़ाबला

लेकिन अति विश्वास में बॉबी चार्ल्टन और मार्टिन पीटर्स को बैठाने का फ़ैसला ग़लत साबित हुआ और जर्मनी ने आख़िरकार 3-2 से जीत हासिल कर ली.

इटली और पश्चिम जर्मनी के बीच हुआ सेमी फ़ाइनल मैच काफ़ी यादगार रहा. ज़बरदस्त मुक़ाबले में इटली ने पश्चिम जर्मनी को 4-3 से हराया जबकि ब्राज़ील ने उरुग्वे को 3-1 से मात दी.

फ़ाइनल के पहले हाफ़ में इटली ने ब्राज़ील पर लगाम लगाए रखा और पेले के 18वें मिनट में दाग़े गोल की बराबरी भी कर दी. लेकिन दूसरे हाफ़ में ब्राज़ील की टीम ने थक चुकी इटली की टीम को काफ़ी परेशान किया और एक के बाद एक तीन गोल किए.

ब्राज़ील ने इटली को 4-1 से हराया और तीसरी बार विश्व कप का ख़िताब जीता. इस वर्ष ब्राज़ील के कोच थे मारियो ज़गालो.

ज़गालो के साथ ख़ास बात ये रही कि इससे पहले 1958 और 1962 में ब्राज़ील ने जब विश्व कप जीता था, उस समय ज़गालो ब्राजील की टीम में शामिल थे और इस साल एक कोच के रूप में टीम के साथ थे।

१९९७ का विश्व कप

ब्राज़ील का वर्चस्व टूटा

1974 में विश्व कप की मेजबानी मिली पश्चिम जर्मनी को. इस विश्व कप के दौरान फ़ुटबॉल की दुनिया में ब्राज़ील का वर्चस्व टूटा.

इस समय दुनिया में यूरोपीय फ़ुटबॉल का दबदबा चल रहा था. हॉलैंड और पश्चिम जर्मनी के सितारे बुलंद थे और दोनों ने इस विश्व कप में इसका प्रदर्शन भी किया.

हालाँकि हॉलैंड की टीम आक्रमक फ़ुटबॉल खेल रही थी और पश्चिम जर्मनी की रणनीति रक्षात्मक खेल की थी. ब्राज़ील ने यूरोपीय फ़ुटबॉल की भद्दी नकल की कोशिश तो की, लेकिन वे इसमें सफल नहीं हो पाए. पेले नहीं खेल रहे थे.

लेकिन ब्राज़ील की टीम दूसरे दौर में पहुँचने में सफल रही. हॉलैंड अपने ग्रुप से आसानी से क्वालीफ़ाई कर गया.

लेकिन पश्चिम जर्मनी के लिए यह आसान नहीं रहा. पूर्वी जर्मनी के हाथों उसे हार मिली, तो चिली और ऑस्ट्रेलिया को हराने में उसे काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी.

पहले दौर से बाहर होने वाली बड़ी टीम थी- इटली. जिसे हेटी को हराने में भी पसीना बहाना पड़ा और पोलैंड से हारकर तो टीम बाहर ही हो गई.

प्रदर्शन

दूसरे दौर में हंगरी का खेल देखते ही बनता था. हंगरी ने अर्जेंटीना को 4-0 से बड़े अंतर से मात दी. पूर्वी जर्मनी को भी हंगरी ने हराया और फिर ब्राज़ील को भी हराकर अपना बेहतरीन प्रदर्शन जारी रखा.

अन्य ग्रुप में पश्चिम जर्मनी और पोलैंड ने स्वीडन और यूगोस्लाविया की चुनौती समाप्त की. अब आख़िरी ग्रुप मैच में यह फ़ैसला होना था कि हॉलैंड का फ़ाइनल में किससे मुक़ाबला होगा.

फ़्रैंकफ़र्ट में हुए इस मैच में पोलैंड ने शानदार खेल का प्रदर्शन तो किया लेकिन घरेलू मैदान पर आख़िरकार पश्चिम जर्मनी की चली और पोलैंड को हार का सामना पड़ा.

हॉलैंड और पश्चिमी जर्मनी के बीच 'ऐतिहासिक दुश्मनी' को देखते हुए इस फ़ाइनल के प्रति लोगों का ज़बरदस्त आकर्षण था. फ़ाइनल में हॉलैंड ने शुरुआत अच्छी की, लेकिन बेकेनबॉवर वाली जर्मन टीम के आगे उसकी नहीं चली.

आख़िरकार पश्चिम जर्मनी की टीम 2-1 से जीत गई और दूसरी बार विश्व कप का ख़िताब जीतने में सफलता पाई।


1978 का विश्व कप

हॉलैंड की हार की दास्तां

1978 का विश्व कप फ़ुटबॉल अर्जेंटीना में हुआ. इस विश्व कप का ख़िताब मेजबान अर्जेंटीना ने जीता. अर्जेंटीना ने फ़ाइनल में हॉलैंड को 3-1 से हराया. फ़ाइनल मैच का फ़ैसला अतिरिक्त समय में हुआ.

अर्जेंटीना ने पहली बार विश्व कप का ख़िताब जीतने में सफलता पाई और विश्व कप जीतने वाली छठी टीम बनी. इस विश्व कप का स्वरूप 1974 के विश्व कप की तरह की रहा.

16 टीमें इसके लिए क्वालीफ़ाई हुईं. टीमों के चार-चार के ग्रुप में रखा गया. ग्रुप मैच के बाद चार-चार टीमों के दो ग्रुप बाँट दिए गए.

इसके बाद दोनों ग्रुपों की विजेता के बीच फ़ाइनल मैच हुआ. लगातार दूसरी बार हॉलैंड की टीम फ़ाइनल मैच में हार गई.

1974 में हॉलैंड की टीम पश्चिम जर्मनी से हार गई थी. इस विश्व में सबसे ज़्यादा गोल मारे मारियो केम्पेस ने. उन्होंने छह गोल दाग़े.

ग्रुप-1 में इटली की टीम शीर्ष पर रही. अर्जेंटीना की टीम को दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ा. ग्रुप-2 में पोलैंड की टीम शीर्ष पर रही.

ग्रुप-3 से ऑस्ट्रिया और ग्रुप-4 से पेरू की टीम शीर्ष पर रही. असली कहानी दूसरे दौर से शुरू हुई. पहले ग्रुप से हंगरी आसानी से जीतकर फ़ाइनल में पहुँच गया. लेकिन दूसरे ग्रुप की कहानी बिल्कुल अलग रही.

सवाल

ग्रुप-बी के दो मैचों के बाद भी ब्राज़ील और अर्जेंटीना के अंक बराबर थे. अब इस ग्रुप का फ़ैसला दोनों टीमों के आख़िरी मैचों पर निर्भर था.

फ़ीफ़ा ने इस बात पर ज़ोर नहीं दिया कि दोनों मैच एक ही समय पर शुरू हों. नतीजा ये हुआ कि ब्राज़ील ने पोलैंड को तो 3-1 से हरा दिया लेकिन अर्जेंटीना के सामने फ़ाइनल में पहुँचने का लक्ष्य भी मिल गया, क्योंकि उसका मैच ब्राज़ील के मैच के बाद हुआ.

अर्जेंटीना ने इसका लाभ उठाया और पेरू को 6-0 के बड़े अंतर से पराजित किया. हालाँकि उस मैच में पेरू के गोलकीपर पर सवाल उठाए गए.

कहा जाता है कि अर्जेंटीना मूल के पेरू के गोलकीपर के कारण ही अर्जेंटीना इतना स्कोर कर पाया. कारण जो भी हो अर्जेंटीना की टीम फ़ाइनल में पहुँचने में सफल रही और ब्राज़ील की टीम बाहर हो गई.

फ़ाइनल मैच काफ़ी उत्तेजना भरा रहा. मेजबान अर्जेंटीना की टीम पहली बार फ़ाइनल खेल रही थी, तो लगातार दूसरी बार फ़ाइनल में उतरी थी हॉलैंड की टीम.

हॉलैंड की टीम का सपना एक बार फिर टूटा और मेजबान टीम ने विश्व विजेता बनने का गौरव हासिल किया। अर्जेंटीना ने फ़ाइनल में हॉलैंड को 2-1 से मात दी।

1978 का विश्व कप

मुश्किल था इटली को रोकना

1982 विश्व कप

1982 में स्पेन में हुए विश्व कप का स्वरूप कुछ बदला हुआ था. इस बार 24 टीमों को विश्व कप में खेलने का मौक़ा मिला. दूसरे ग्रुप स्टेज को दोबारा शामिल किया गया और यह भी तय हुआ कि सेमी फ़ाइनल मैच भी खेले जाएँगे.

अब चार-चार टीमों को छह ग्रुपों में शामिल किया गया. ग्रुप स्टेज़ के एक मैच में हंगरी ने अल सल्वाडोर को 10-1 से मात दी, तो अल्जीरिया ने पश्चिमी जर्मनी को 2-1 से हराकर सनसनी फैलाई.

स्कॉटलैंड की टीम ब्राज़ील से 4-1 से हार गई. सोवियत संघ से 2-2 की बराबरी के साथ ही स्कॉटलैंड की टीम प्रतियोगिता से बाहर हो गई.

इंग्लैंड ने शुरुआत तो अच्छी की. फ़्रांस को उसने 3-1 से हराया. इंग्लैंड ने चेकोस्लोवाकिया और ट्यूनीशिया को भी हराया. लेकिन दूसरे दौर में पश्चिम जर्मनी और स्पेन से हारकर इंग्लैंड की टीम ख़ाली हाथ स्वदेश लौटी.

डिएगो माराडोना के साथ उतरी अर्जेंटीना की टीम अपना पहला मैच बेल्जियम से हार गई लेकिन दूसरे दौर में जगह बनाने में सफल रही.

लेकिन दूसरे दौर में उसका मुक़ाबला ब्राज़ील और इटली जैसी टीमों से था. ब्राज़ील ने 1970 के बाद अपनी बेहतरीन टीम उतारी. ज़ीको, सोक्रेटिस, एडर और फ़ाल्काओ जैसे खिलाड़ियों से सजी थी ब्राज़ील की टीम.

क़ीमत

लेकिन कारेका घायल होने के कारण खेल नहीं पाए और ब्राज़ील को इसकी क़ीमत चुकानी पड़ी.

1982 विश्व कप

ख़िताब हासिल करने की ख़ुशी

अर्जेंटीना की टीम दूसरे दौर में फ़्लॉप साबित हुई. इटली की टीम ने उसे मात दी और ब्राज़ील के हाथों भी उसे 3-1 से पराजित होना पड़ा.

इस मैच में ब्राज़ील के बटिस्टा को फ़ाउल करने के कारण माराडोना को मैदान से बाहर कर दिया गया. लेकिन ब्राज़ील का रास्ता आसान नहीं था. ख़िताब की दावेदार मानी जाने वाली ब्राज़ील की टीम इटली के हाथों हारकर बाहर हो गई.

पहले सेमी फ़ाइनल में इटली का मुक़ाबला था पोलैंड से. इटली ने पोलैंड को मात देकर 12 सालों में पहली बार विश्व कप के फ़ाइनल में जगह बनाई.

फ़्रांस और पश्चिमी जर्मनी के बीच दूसरा सेमी फ़ाइनल दो शक्तिशाली देश के बीच ज़बरदस्त जंग थी. आख़िरकार पश्चिम जर्मनी ने फ़्रांस को 5-4 से हराकर फ़ाइनल में प्रवेश किया.

फ़ाइनल में इटली की टीम को रोकना मुश्किल लग रहा था और हुआ भी यही। 3-1 से फ़ाइनल मैच जीतकर इटली ने विश्व कप का ख़िताब जीत लिया.

1986 में विश्व कप

माराडोना के विवादित गोल की कहानी

विश्व कप 1986

1986 में विश्व कप की मेज़बानी पहले कोलंबिया को देने का फ़ैसला हुआ था. लेकिन सुविधाओं की कमी के आधार पर मेज़बानी मैक्सिको को सौंपी गई.

हालाँकि ब्राज़ील और अमरीका ने भी मेज़बानी का प्रस्ताव सौंपा था. एक साल पहले ही मैक्सिको सिटी में ज़बरदस्त भूकंप आया था और आगे भी भूकंप की भविष्यवाणी की गई थी. लेकिन विश्व कप आराम से हुआ.

इस विश्व कप की ख़ासियत थी- पेले के बाद डिएगो माराडोना जैसे स्टार खिलाड़ी का उदभव. हालाँकि 1982 के विश्व कप में भी माराडोना खेले थे लेकिन इस विश्व कप में उनका प्रदर्शन देखने लायक़ था.

इस विश्व कप में भी प्रतियोगिता के स्वरूप में थोड़ा बदलाव हुआ और दूसरे दौर के मैचों की जगह सीधे नॉक आउट मैचों का प्रावधान किया गया.

नॉक आउट स्टेज के लिए हर ग्रुप की दो शीर्ष टीमों को क्वालीफ़ाई करना था जबकि तीसरे स्थान पर रहने वाली चार सर्वश्रेष्ठ टीमों को भी नॉक आउट चरण में खेलने का अवसर मिला.

इस विश्व कप का पहला मैच इटली और बुल्गारिया के बीच हुआ. मैच एक-एक से ड्रॉ हुआ. ग्रुप-ए से अर्जेंटीना, इटली और बुल्गारिया की टीमों ने क्वालीफ़ाई किया.

ग्रुप-बी से मेक्सिको, पराग्वे और बुल्गारिया ने क्वालीफ़ाई किया जबकि सोवियत संघ और फ़्रांस ने ग्रुप-सी से क्वालीफ़ाई किया. ब्राज़ील के पास अभी भी ज़ीको, सोक्रेटस और करेका जैसे स्टार खिलाड़ी थे. ब्राज़ील की टीम बिना कोई मैच हारे दूसरे दौर में पहुँची. ग्रुप-डी से ब्राज़ील के साथ स्पेन की टीम दूसरे दौर में पहुँची.

ग्रुप-ई से डेनमार्क, पश्चिम जर्मनी और उरुग्वे ने दूसरे दौर में जगह बनाई. ग्रुप-एफ़ से मोरक्को, इंग्लैंड और पोलैंड की टीमों ने दूसरे दौर में जगह बनाई.

क्वार्टर फ़ाइनल

क्वार्टर फ़ाइनल में भी इंग्लैंड, ब्राज़ील, फ़्रांस, पश्चिम जर्मनी, स्पेन, मैक्सिको, अर्जेंटीना जैसी शीर्ष टीमों ने जगह बनाई. यह विश्व कप जहाँ माराडोना के प्रभावशाली खेल की बदौलत चर्चा में रहा, वहीं विवादों की छाया से भी यह विश्व कप अलग नहीं रहा.

विश्व कप 1986

ये था माराडोना का विवादित गोल

इंग्लैंड और अर्जेंटीना के बीच हुआ क्वार्टर फ़ाइनल मैच आज भी माराडोना के विवादित गोल की बदौलत चर्चा में रहता है. बाद में माराडोना ने भी गोल में 'दैवीय हाथ' की बात स्वीकार की.

अन्य क्वार्टर फ़ाइनल मैच में फ़्रांस ने ब्राज़ील को पेनल्टी शूट आउट में 4-3 से हराया. पश्चिम जर्मनी ने मेक्सिको को पेनल्टी शूट आउट में 4-1 से हराया.

जबकि बेल्जियम ने स्पेन को पेनल्टी शूट आउट में 5-4 से मात दी. सेमीफ़ाइनल में पश्चिम जर्मनी ने फ़्रांस को 2-0 से हराया. अर्जेंटीना ने बेल्जियम को भी इतने ही अंतर से हराया.

पश्चिम जर्मनी के कोच बेकेनबॉवर ने पहले ही कह दिया था कि उनकी टीम इतनी मज़बूत नहीं कि विश्व कप जीत सके.

अर्जेंटीना ने शुरू में 2-0 की बढ़त हासिल कर ली। लेकिन जर्मनी ने वापसी करते हुए स्कोर की बराबरी कर ली। लेकिन अर्जेंटीना ने एक और गोल करके 3-2 से जीत हासिल कर ली और दूसरी बार ख़िताब जीतने में सफलता पाई.

१९९४ में विश्व कप

विश्व कप से बाहर हुए माराडोना

1994 का विश्व कप

फ़ीफ़ा ने 1988 में ही यह फ़ैसला कर लिया था कि 1994 का विश्व कप अमरीका में आयोजित होगा.

मोरक्को और ब्राज़ील की दावेदारी को ख़ारिज़ करते हुए अमरीका को मेजबानी देने के फ़ैसले पर लोगों को अचरज भी हुआ क्योंकि अमरीका में फ़ुटबॉल के प्रति लोगों का उत्साह कम था.

लेकिन इसके बावजूद अमरीका में हुआ विश्व कप आयोजन के मामले में सफल माना जाता है. हर मैच के लिए औसत 69 हज़ार दर्शक स्टेडियम में जुटे.

1990 की तरह इस विश्व कप में भी 24 टीमों ने क्वालीफ़ाई किया और चार-चार टीमों के छह ग्रुप में उन्हें बाँटा गया.

इस विश्व कप में सभी टीमों ने आक्रमक फ़ुटबॉल का प्रदर्शन किया. फ़ीफ़ा ने टैकल के नियमों में कुछ फेरबदल किया और जीतने वाली टीम को तीन अंक देने का भी फ़ैसला किया गया. इस कारण टीम की अग्रिम पंक्ति के खिलाड़ियों को आक्रामक खेल दिखाने में और सुविधा हुई.

जहाँ ब्राज़ील के खिलाड़ियों ने इस प्रतियोगिता में अपनी बेहतरीन क्षमता का प्रदर्शन किया, वहीं अर्जेंटीना के डिएगो माराडोना के कारण प्रतियोगिता पर विवाद की छाया भी रही.

माराडोना प्रतिबंधित दवाओं के सेवन के दोषी पाए गए और टूर्नामेंट से निकाल दिए गए. और तो और अमरीका के ख़िलाफ़ कोलंबिया के मैच हारने के कारण उसके एक खिलाड़ी की हत्या कर दी गई.

कोलंबिया के खिलाड़ी एस्कोबार ने ग़लती से गेंद अपने ही गोलपोस्ट में डाल दी थी. टीम के स्वदेश लौटने पर उनकी हत्या कर दी गई.

बुल्गारिया ने प्रतियोगिता का सबसे बड़ा उलटफेर किया. उसने सेमी फ़ाइनल में जर्मनी को हराकर उसे प्रतियोगिता से बाहर कर दिया.बुल्गारिया के स्ट्वाइचकोव प्रतियोगिता में छह गोल मार कर सबसे ज़्यादा गोल मारने वाले खिलाड़ी बने.

इटली की टीम किसी तरह दूसरे दौर में जगह बना पाने में सफल रही. लेकिन रोमारियो और बबेटो जैसे खिलाड़ियों की बदौलत ब्राज़ील की टीम आसानी से क्वार्टर फ़ाइनल में जगह बनाने में सफल रही.

जीत

क्वार्टर फ़ाइनल में ब्राज़ील का मुक़ाबला था हॉलैंड से. ब्राज़ील की टीम एक समय 2-0 से आगे थी.

माराडोना

लेकिन हॉलैंड ने शानदार वापसी की और स्कोर बराबर कर दिया. लेकिन मैच ख़त्म होने से पहले ब्राज़ील ने अपने पुराने खिलाड़ी ब्रैंको को मैदान में उतारा और उन्होंने शानदार गोल करके अपनी टीम को जीत दिला दी.

एक अन्य क्वार्टर फ़ाइनल मैच में इटली ने स्पेन को 1-0 से हराकर सेमी फ़ाइनल में जगह बनाई. इटली ने सेमी फ़ाइनल में बुल्गारिया की चुनौती तोड़ी तो ब्राज़ील ने स्वीडन को 1-0 से हराकर फ़ाइनल में जगह बनाई.

क़रीब 94 हज़ार दर्शकों की मौजूदगी में फ़ाइनल हुआ ब्राज़ील और इटली के बीच. इटली की टीम ज़रूरत से ज़्यादा रक्षात्मक हो गई और अतिरिक्त समय के बाद भी दोनों टीमें गोल नहीं कर पाईं.

फिर फ़ैसला पेनल्टी शूट आउट के ज़रिए हुआ। ब्राज़ील ने पेनल्टी शूट आउट में विश्व कप का ख़िताब जीता और स्कोर रहा 3-2। ब्राज़ील को चौथी बार विश्व कप का ख़िताब मिला.


१९९८ विश्व कप

ज़िनेदिन ज़िदान का जलवा

1998 का विश्व कप

क़रीब 60 साल बाद फ़ुटबॉल विश्व कप फ़्रांस लौटा. इस बार विश्व कप में 32 टीमें शामिल हुईं. लेकिन विश्व कप का आयोजन सफल साबित हुआ.

ब्राज़ील की टीम इस साल भी ख़िताब की बहुत बड़ी दावेदार थी. ब्राज़ील के स्टार खिलाड़ी रोनाल्डो अपने प्रदर्शन के बेहतरीन दौर में थे. रोमारियो घायल थे, इसलिए रोनाल्डो पर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी थी.

ब्राज़ील ने प्रतियोगिता में अच्छी शुरुआत की. हालाँकि स्कॉटलैंड के ख़िलाफ़ 2-1 से मैच जीतने में टीम को थोड़ा पसीना बहाना पड़ा.

लेकिन अगले ही मैच में मोरक्को को 3-0 से हराकर टीम में उत्साह लौट आया. लेकिन पहले दौर के मैच में नॉर्वे के हाथों मिली हार ने टीम का मनोबल काफ़ी कमज़ोर किया. 1966 के बाद पहली बार ब्राज़ील की टीम पहले दौर का कोई मैच हारी थी.

मेज़बान फ़्रांस ने पहले दौर की शानदार शुरुआत की. फ़्रांस ने दक्षिण अफ़्रीका, सऊदी अरब और डेनमार्क को हराकर पहले दौर की शुरुआत की.

लेकिन सऊदी अरब के ख़िलाफ़ मैच में मैक्सिको के रेफ़री ने ज़िनेदिन ज़िदान को रेड कार्ड दिखा दिया और फ़्रांस को दूसरे दौर की शुरुआत अपने स्टार खिलाड़ी के बिना ही करनी पड़ी.

दूसरे दौर में पहुँचने वाली 16 टीमों में से 10 यूरोपीय टीमें थी. दूसरे दौर में इटली ने नॉर्वे को 1-0 से मात दी तो ब्राज़ील ने चिली को 4-1 से रौंदा.

फ़्रांस ने पराग्वे को हराया तो इंग्लैंड को अर्जेंटीना के हाथों हार मिली. इसी मैच में इंग्लैंड की ओर से माइकल ओवन ने एक ख़ूबसूरत गोल किया था.

क्वार्टर फ़ाइनल में बड़ा उलटफेर उस समय हुआ जब क्रोएशिया ने जर्मनी को 3-0 से हराकर बाहर कर दिया. मेजबान फ़्रांस और इटली के बीच क्वार्टर फ़ाइनल मैच पेनल्टी शूट आउट में गया और फ़ैसला फ़्रांस के हक़ में 4-3 से गया.

रोनाल्डो का सच?

ब्राज़ील ने डेनमार्क को 3-2 से हराया जबकि नीदरलैंड्स ने अर्जेंटीना को 2-1 से हराकर प्रतियोगिता से बाहर कर दिया. सेमीफ़ाइनल में मेजबान फ़्रांस की भिड़ंत थी क्रोएशिया से और ब्राज़ील और नीदरलैंड्स आमने-सामने थे.

रोनाल्डो

रोनाल्डो की बीमारी का सच अब भी सामने नहीं आया है

पहले सेमी फ़ाइनल में फ़्रांस ने क्रोएशिया को 2-1 से हराया. लेकिन नीदरलैंड्स और ब्राज़ील का मैच 1-1 से बराबर रहा.

फ़ैसला पेनल्टी शूट आउट में ब्राज़ील के पक्ष में गया. ब्राज़ील ने 4-2 से यह मैच जीता. ब्राज़ील की टीम एक बार फिर फ़ाइनल में पहुँची. लेकिन इस बार उसके ख़िलाफ़ थी मेजबान टीम फ़्रांस.

फ़ाइनल में ब्राज़ील के स्टार खिलाड़ी रोनाल्डो को लेकर जो अफ़वाहों का बाज़ार गर्म रहा, उसकी सच्चाई आज तक सामने नहीं आ पाई है.

कहा गया कि रोनाल्डो का घुटना जवाब दे गया था, तो ये भी कहा गया कि वे बेहोश हो गए थे. ख़ैर जो भी हो, टीम शीट से उनका नाम ग़ायब था.

लेकिन बाद में वे टीम में आए. वे थके हुए नज़र आ रहे थे. लोगों को कहीं से वो रोनाल्डो नज़र नहीं आया, जिसके लिए वे जाने जाते थे.

दूसरी ओर फ्रांस के स्टार खिलाड़ी ज़िनेदिन ज़िदान अभी तक पूरे फ़ॉर्म में आ गए थे और उनका प्रदर्शन देखने लायक़ था.

'बीमार' रोनाल्डो के कारण ब्राज़ील की टीम अपने फ़ॉर्म में नज़र नहीं आई। इसका अंदाज़ा इसी से होता है कि वे एक गोल भी नहीं मार पाए। फ़्रांस ने ज़िनेदिन ज़िदान के दो गोलों की बदौलत ब्राज़ील को 3-0 से हराकर और विश्व कप का ख़िताब जीत लिया.

विश्व कप २००२

रोनाल्डो और ब्राज़ील की जीत

रोनाल्डो

वर्ष 2002 का विश्व कप की मेज़बानी दक्षिण कोरिया और जापान को संयुक्त रूप से मिली. पहली बार ऐसा हुआ कि दो देशों ने मिल कर विश्व कप की मेज़बानी की.

इस कारण ऐसा पहली बार हुआ कि तीन देशों चैम्पियन फ़्रांस और मेज़बान देश दक्षिण कोरिया के साथ-साथ जापान को विश्व कप में सीधे प्रवेश मिला.

पिछले विश्व कप की ख़राब यादों को भूलते हुए ब्राज़ील के स्टार स्ट्राइकर रोनाल्डो ने फ़ाइनल में अपने पैर का जादू दिखाया और जर्मनी की टीम को पछाड़ते हुए अपने देश को विश्व कप का ख़िताब दिलवाया.

रोनाल्डो ने फ़ाइनल के दो गोल मारे. रोनाल्डो ने इस विश्व कप में आठ गोल मारे और प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट का ख़िताब भी पाया. लेकिन इस दौड़ में उनके साथी खिलाड़ी रिवाल्डो ने भी उन्हें अच्छी चुनौती दी.

फ़्रांस की ख़स्ता हालत

1970 के बाद ब्राज़ील ऐसी टीम बनी, जिसने विश्व कप में अपने सभी मैच जीते. 1970 में भी ब्राज़ील ने ही यह कारनामा दिखाया था.

रोनाल्डो

इससे पहले उरुग्वे ने 1930 में और इटली ने 1938 में यह सफलता हासिल की थी. वैसे इस विश्व कप की शुरुआत धमाकेदार अंदाज़ में हुई जब सेनेगल ने चैम्पियन फ़्रांस को हराकर सनसनी फैला दी.

फ़्रांस की शुरुआती ऐसी ख़राब हुई कि डेनमार्क ने 3-0 से हराकर उसे प्रतियोगिता से ही बाहर कर दिया. पहले दौर से अर्जेंटीना भी बाहर हो गया, लेकिन उसका ग्रुप काफ़ी कठिन था.

उस ग्रुप को ग्रुप ऑफ़ डेथ का भी नाम दिया गया था. क्योंकि इस ग्रुप में इंग्लैंड, स्वीडन, अर्जेंटीना और नाइजीरिया की टीमें शामिल थी. दूसरे दौर में पहुँचने का मौक़ा मिला स्वीडन और इंग्लैंड को.

मेज़बान जापान और दक्षिण कोरिया की टीमें भी दूसरे दौर में पहुँचने में क़ामयाब हुईं.

क्वार्टर फ़ाइनल में पहुँचने का सौभाग्य मिला ब्राज़ील, सेनेगल, इंग्लैंड, तुर्की, स्पेन, दक्षिण कोरिया, जर्मनी और अमरीका की टीमें. क्वार्टर फ़ाइनल में ब्राज़ील ने इंग्लैंड को 2-1 से हराया तो तुर्की ने सेनेगल को हराकर बाहर किया.

दक्षिण कोरिया ने पेनल्टी शूट आउट में स्पेन को चलता किया तो जर्मनी सिर्फ़ एक गोल के अंतर से ही अमरीका को हरा पाया.

सेमीफ़ाइनल में ब्राज़ील ने तुर्की को हराया तो जर्मनी के हाथों दक्षिण कोरिया की हार हुई। फ़ाइनल में रोनाल्डो के बेहतरीन खेल की बदौलत ब्राज़ील ने जर्मनी को हराकर पाँचवीं बार ख़िताब जीता।

विश्व कप २००६

इटली ने किया बड़ा उलटफेर

विश्व कप 2006

वर्ष 2006 का फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप जर्मनी में आयोजित हुआ. कई धुरंधर टीमों की दावेदारी के बीच आख़िरकार इटली की टीम ने बाज़ी मारी. ये इटली का चौथा खिताब था.

फ़ाइनल में इटली ने फ़्रांस की टीम को मात दी. फ़्रांस के मशहूर खिलाड़ी ज़िनेदिन ज़िदान को रेड कार्ड मिलना फ़ाइनल का निर्णायक पल साबित हुआ.

हताश-परेशान फ़्रांस की टीम अपने स्टार खिलाड़ी की कमी को झेल नहीं पाई और पेनल्टी शूटआउट में इटली ने फ़्रांस को 5-3 से हरा दिया.

फ़ाइनल के दौरान ज़िनेदिन ज़िदान का इटली के खिलाड़ी मैतरात्ज़ी को सर से टक्कर मारने की तस्वीर कई दिनों तक सुर्ख़ियों में रही.

जर्मनी की टीम तीसरे और पुर्तगाल की टीम चौथे स्थान पर रही. ब्राज़ील की टीम को इस प्रतियोगिता में बड़ा दावेदार माना जा रहा था, लेकिन क्वार्टर फ़ाइनल में फ़्रांस के हाथों उसे हार मिली और टीम प्रतियोगिता से बाहर हो गई.

इंग्लैंड की टीम भी क्वार्टर फ़ाइनल में हार कर प्रतियोगिता से बाहर हुई. वर्ष 2006 का विश्व कप कई मायनों में अनोखा था. टेलीविज़न दर्शकों के मामले में इस विश्व कप ने इतिहास बनाया.

इस विश्व कप में पहली बार तीन ऐसी टीमों ने हिस्सा लिया, जिनकी राष्ट्रभाषा पुर्तगीज़ है. ये टीमें थी- पूर्तगाल, ब्राज़ील और अंगोला.

वर्ष 1982 के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि किसी विश्व कप के सेमी फ़ाइनल में सिर्फ़ यूरोपीय टीमें आमने-सामने थी. भले ही मेज़बान जर्मनी की टीम विश्व कप का ख़िताब जीत नहीं पाई, लेकिन प्रतियोगिता काफ़ी सफल रही.

प्रदर्शन

जर्मनी के मिरोस्लाव क्लोज़ा को गोल्डन बूट मिला, उन्होंने इस विश्व कप में सर्वाधिक पाँच गोल मारे. जबकि विवादों के बावजूद फ़्रांस के ज़िनेदिन ज़िदान विश्व कप के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुने गए.

ज़िदान

ज़िदान को रेड कार्ड दिखाया गया था

ऑस्ट्रेलिया, इक्वेडोर और घाना जैसे देशों के शुरुआती दौर में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद वर्ष 2006 का विश्व कप पारंपरिक फुटबॉल के लिए ज़्यादा जाना गया.

पारंपरिक फ़ुटबॉल खेलने वाली टीमों का वर्चस्व इस विश्व कप में बना रहा. इस विश्व कप में सभी आठ वरीयता प्राप्त टीमों ने नॉक आउट स्टेज तक अपनी जगह बनाई.

साथ ही क्वार्टर फ़ाइनल में यूरोप और दक्षिण अमरीका के बाहर की कोई टीम नहीं थी. अर्जेंटीना और ब्राज़ील की टीमें क्वार्टर फ़ाइनल में ही बाहर हो गई और सेमी फ़ाइनल में सिर्फ़ यूरोप की टीमें बच गईं.

वर्ष 1934, 1966 और 1982 के बाद ये पहला मौक़ा था, जब सेमी फ़ाइनल की सभी टीमें यूरोप से थी।


२०१० का विश्व कप

फ़ुटबॉल विश्व कप पर स्पेन का क़ब्ज़ा

स्पेन की टीम विजयी

स्पेन की टीम की पासिंग शैली पूरे विश्व कप मुक़ाबले के दौरान बेहतरीन रही

स्पेन की टीम दुनिया की उन चंद टीमों में शुमार हो गई है, जिसने फ़ुटबॉल का विश्व कप जीता है. जोहानेसबर्ग में खचाखच भरे सॉकर सिटी स्टेडियम में स्पेन ने दुनिया को दिखाया कि उनमें भी दम है.

यूरो 2008 की चैम्पियन स्पेन की टीम ने इस विश्व कप में पहली बार सेमी फ़ाइनल और फिर फ़ाइनल में ख़िताब पर क़ब्ज़ा करने में सफलता पाई.

दोनों देशों के समर्थकों से भरे स्टेडियम में जब स्पेन के कप्तान कैसियास ने विश्व कप की ट्रॉफ़ी उठाई, तो स्पेनिश समर्थकों का उत्साह देखते ही बनता था.

गाना-बजाना और आतिशबाज़ी के बीच उन्होंने अपनी टीम को वो सपना साकार करते देखा, जो वर्षों से वो देख रहे थे.

दूसरी ओर नीदरलैंड्स की टीम तीसरी बार भी दुर्भाग्यशाली साबित हुई और उसे दूसरे स्थान से ही संतोष करना पड़ा.

वर्ष 1974 और 1978 के बाद टीम ने पहली बार फ़ाइनल में जगह बनाई थी, लेकिन इस बार भी उनके हिस्से में ट्रॉफ़ी नहीं आई.

मैच में तनाव

हावर्ड वेब

मैच रेफ़री हावर्ड वेब ने कुल 14 पीले कार्ड दिखाए

नीदरलैंड्स और स्पेन के बीच हुए फ़ाइनल में काफ़ी तनाव था. मैच में काफ़ी उठा-पटक भी हुई. खिलाड़ियों ने गोल करने के कई सुनहरे अवसर गँवाए तो 14 खिलाड़ियों को पीला कार्ड दिखाया गया.

मैच के 109वें मिनट में तो नीदरलैंड्स के जॉनी हेटिंजा को दूसरी बार पीला कार्ड मिला और फिर लाल कार्ड दिखाकर उन्हें मैदान से बाहर कर दिया गया.

इसके बाद 10 खिलाड़ियों से खेल रही नीदरलैंड्स की टीम दबाव में आई और फिर गोल भी हुआ.

मैच के शुरू से ही स्पेन ने पकड़ बनाए रखी. हालाँकि बीच-बीच में नीदरलैंड्स के खिलाड़ी भी अपना रुतबा दिखा रहे थे.

लेकिन पूरे मैच की बात करें, तो स्पेन ने एक बार फिर दिखाया कि गेंद पर नियंत्रण रखने में उनका कोई सानी नहीं.

गोल करने के मौक़े

इस मैच के दौरान स्पेन के खिलाड़ियों को गोल करने के कई बेहतरीन मौक़े मिले, तो नीदरलैंड्स के आयन रॉबेन ने भी दो बार गोल करने का अच्छा अवसर हाथ से निकल जाने दिया. रॉबेन अब उस क्षण का जीवन पर पछतावा करेंगे.

लेकिन ये मैच इंग्लिश रेफ़री के बार-बार खिलाड़ियों को पीला कार्ड देने के कारण भी जाना जाएगा. मैच के शुरुआती 28 मिनट में उन्होंने पाँच खिलाड़ियों को पीला कार्ड दिखा दिया था.

नीदरलैंड्स के आयन रॉबेन ने गोल करने का मौक़ा गँवाया, तो स्पेन के डेविड विया, सर्जियो रामोस को भी अच्छे अवसर मिले थे. लेकिन सबसे बेहतरीन मौक़ा फ़ेब्रिगास को मिला, लेकिन वे भी गोल नहीं कर पाए.

90 मिनट में फ़ैसला नहीं हुआ तो मैच अतिरिक्त समय में गया और अतिरिक्त समय का पहला हाफ़ भी गोलरहित रहा. लेकिन अतिरिक्त समय के दूसरे हाफ़ में स्पेन को वो स्वर्णिम अवसर मिल ही गया, जिसके लिए उसके समर्थक सांस रोके मैच देख रहे थे.

मैच के 116वें मिनट में इनिएस्टा ने गोल करके अपनी टीम और समर्थकों को झूमने-नाचने पर विवश कर दिया.

इनिएस्टा का ये गोल ऐसे समय में हुआ जब नीदरलैंड्स के पास गोल उतारने के लिए काफ़ी कम समय बचे थे. और वही हुआ नीदरलैंड्स की टीम कुछ नहीं कर सकी.

शकीरा

शकीरा के वाका वाका ने लोगों का दिल जीत लिया

...और फिर जैसे ही रेफ़री ने मैच समाप्ति की सीटी बजाई....खिलाड़ी मैदान में, समर्थक स्टेडियम और स्टेडियम के बाहर दीवाने हो गए. जश्न का आलम ये था कि किसी को ख़ुद की परवाह नहीं थी.

बस जश्न था और कुछ नहीं....होता भी क्यों ना, स्पेन की टीम फ़ुटबॉल की दुनिया की शहंशाह जो बन गई है...

समापन समारोह

फ़ाइनल मैच से पहले समापन समारोह में भी ख़ूब नाच-गाना हुआ. अफ़्रीक़ी संस्कृति की झलक दिखाते कई कार्यक्रम पेश किए गए....तो शकीरा ने एक बार फिर इस विश्व कप का आधिकारिक गाना वाका वाका गाकर लोगों को मुग्ध कर दिया.

लेकिन स्टेडियम में सबसे ज़्यादा शोर उस समय हुआ, जब पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला कुछ समय के लिए स्टेडियम में आए और हाथ हिलाकर लोगों का अभिवादन दिया..लोगों ने भी वुवुज़ेला की तेज़ ध्वनि से अपने नेता का स्वागत किया.

दुनिया के बेहतरीन कोच

फ़ुटबॉल में टीम के कोच अहम भूमिका निभाते हैं. उनका खेल में सीधा दखल नहीं होता, लेकिन कोई भी टीम अच्छे कोच के बिना चमक नहीं सकती.

कोई भी फ़ुटबॉल टीम अगर किसी प्रतियोगिता में अच्छा प्रदर्शन करती है, तो उसका आधा श्रेय टीम के कोच को भी मिलता है.

कोच को कई बहुत महत्वपूर्ण फ़ैसले करने होते हैं. कौन से 11 खिलाड़ी मैच में उतरेंगे और कब किस खिलाड़ी को बदलना है. ये सब फ़ैसले टीम की हार-जीत से जुड़े होते हैं.

तो आइए नज़र डालते हैं विश्व फ़ुटबॉल की कुछ ऐसी ही हस्तियों पर, जिन्होंने कोच पद पर रहते अपनी काबलियत से सबका दिल जीता.

एन्ज़ो बेयर्ज़ोट

इटली में फ़ुटबॉल पर बेयर्ज़ोट का योगदान काफ़ी अहम है. पहले एक फ़ुटबॉल खिलाड़ी के रूप में और फिर कोच के रूप में. इटली ने वर्ष 1982 का विश्व कप उनके अधीन जीता था. एक फ़ुटबॉल खिलाड़ी के रूप में बेयर्ज़ोट ने इटली के कई क्लबों की शोभा बढ़ाई. इनमें इंटर मिलान भी शामिल है. लेकिन उन्हें कोच के रूप में ज़्यादा जाना जाता है और ख़ासकर 1982 का विश्व कप जीतने में उनकी भूमिका के लिए.

वर्ष 1974 के विश्व कप के दौरान वे इटली के सहायक कोच थे. अगले विश्व कप यानी 1978 के विश्व कप में उन्होंने प्रमुख कोच की भूमिका निभाई और इटली को सेमी फ़ाइनल तक ले गए. लेकिन ख़िताबी जीत वर्ष 1982 में मिली, जब 44 साल बाद उन्होंने इटली को विश्व कप जिताने में मदद की. इटली की 1982 की ख़िताबी जीत इसलिए भी अहम मानी जाती है क्योंकि विश्व कप से पहले इटली की राष्ट्रीय टीम को लेकर काफ़ी विवाद चल रहा था. लेकिन बेयर्ज़ोट ने ऐसी रणनीति बनाई, जिससे टीम का ध्यान सिर्फ़ खेल पर रहा.

रिनॉस मिचेल्स

फ़ुटबॉल के इतिहास में मिचेल्स का अहम योगदान है. उनकी रणनीति ने नीदरलैंड्स की टीम को फ़ुटबॉल की दुनिया की एक शक्ति के रूप में स्थापित किया. नीदरलैंड्स के राष्ट्रीय कोच बनने से पहले मिचेल्स ने फ़ुटबॉलर के रूप में भी अपनी धाक जमाई थी. आएक्स एम्सटर्डम क्लब से भी उन्होंने खेलते हुए शानदार प्रदर्शन किया और 257 मैचों में 120 लोग मारे.

मिचेल्स ने कोच के रूप में अपना करियर इसी क्लब से शुरू किया. बार्सिलोना एफ़सी के भी वे कोच रहे. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय टीम के कोच के रूप में ज़िम्मेदारी संभाली. मिचेल्स कहा करते थे कि फ़ुटबॉल एक युद्ध है. फ़ुटबॉल में कई आधुनिक विचार डालने वाले के रूप में मिचेल्स का योगदान ज़बरदस्त है. फ़ुटबॉल को युद्ध से जोड़ने के कारण उन्हें जनरल का उपनाम दे दिया गया.

उन्हें 'टोटल फ़ुटबॉल' का जनक भी कहा जाता है. इस तरह के फ़ुटबॉल में किसी खिलाड़ी का स्थान नियत नहीं होता, सभी खिलाड़ी साथ में आक्रमण करते थे और साथ में विरोधी टीम के आक्रमण की हवा भी निकालते थे.

लुईस मेनोटी

फ़ुटबॉल के इतिहास में मेनोटी महानतम कोचों में से एक माने जाते हैं. उन्हें 1978 में अर्जेंटीना को विश्व कप का ख़िताब दिलाने के कारण याद किया जाता है. एक फ़ुटबॉलर के रूप में भी उन्होंने अर्जेंटीना की फ़ुटबॉल टीम का प्रतिनिधित्व किया. वे बोका जूनियर्स और सैन्टोस जैसे क्लबों से भी खेले. 1973 में उन्होंने हुराकैन क्लब टीम के कोच के रूप में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया. इसी की बदौलत उन्हें अर्जेंटीना की राष्ट्रीय टीम का ज़िम्मा मिला. वर्ष 1978 में उन्होंने टीम चयन में शानदार रणनीति बनाई और अपनी टीम को पहली बार विश्व कप का ख़िताब दिलवाया.

मेनोटी का यह योगदान इसलिए भी काफ़ी अहम हो जाता है, क्योंकि देश की राजनीतिक स्थिति उस समय ठीक नहीं थी और राजनीतिक कारणों से उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. इस स्थिति में विश्व कप जीतना वाकई बड़ी चुनौती थी. उस समय अर्जेंटीना मेज़बान भी था और अपने घरेलू मैदान पर जीत हासिल करने का उसके पास सुनहरा मौक़ा था, जो उन्होंने हासिल भी किया.

विटोरियो पोत्सो

इटली के फ़ुटबॉल में पोत्सो का नाम काफ़ी सम्मान के साथ लिया जाता है. पोत्सो की प्रतिभा का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने लगातार दो विश्व कप में इटली को ख़िताबी जीत दिलवाई.

ये विश्व कप थे- 1934 और 1938 के विश्व कप. उनकी रणनीति काफ़ी लोकप्रिय हुई और काम की भी साबित हुई. इसी रणनीति की बदौलत उन्होंने लगातार दो विश्व कप में टीम को जीत दिलाई. उनकी रणनीति का ये भी फ़ायदा था कि टीम का डिफ़ेंस काफ़ी तगड़ा था और टीम आसानी से पलटवार भी कर सकती थी.

गुस्ताव शेबेश

हंगरी के फ़ुटबॉल का स्वर्ण युग शेबेश के काल में आया था. वे वर्ष 1952 के विश्व कप में राष्ट्रीय टीम के कोच थे. इस विश्व कप के फ़ाइनल में हंगरी की टीम जर्मनी से हार गई. लेकिन हंगरी ने उस विश्व कप में बड़ा उलटफेर करते हुए फ़ाइनल में जगह बनाई थी. पुश्काश और कॉचिश जैसे नामी खिलाड़ियों का उदभव भी उसी विश्व कप की देन है.

हंगरी ने वर्ष 1952 में ओलंपिक का गोल्ड मेडल जीता. उस समय टीम के कोच शेबेश ही थे. शेबेश ने भी कई अच्छी रणनीतियाँ बनाई, जो फ़ुटबॉल में काफ़ी लोकप्रिय हुई.

सर अल्फ़्रेड अर्नेस्ट रैमसे

सर रैमसे पूर्व फ़ुटबॉल खिलाड़ी और इंग्लैंड की टीम के कोच थे. उन्हें वर्ष 1966 में इंग्लैंड के पहली और अब तक एकमात्र बार विश्व कप जीतने के लिए याद किया जाता है. इसके बाद ही उन्हें नाइटहुड से सम्मानित किया गया. फ़ुटबॉल खिलाड़ी के रूप में अपने करियर के दौरान वे काफ़ी प्रभावी डिफ़ेंडर थे.

लेकिन पेनल्टी लेने में भी उन्हें महारत हासिल थी. इसी कारण उन्हें 'जनरल ऑफ़ पेनल्टी' भी कहा जाता था. उन्हें टीम में युवा और बेहतरीन खिलाड़ियों को आगे लाने के लिए भी याद किया जाता है. टीम का कोच बनने के बाद उन्होंने टीम चयन में ख़ूब दखल दिया.

एमे ज़ैके

फ़्रांस टीम के कोच रहे ज़ैके ने पहली बार फ़्रांस को फ़ुटबॉल विश्व कप जीतने में अहम भूमिका निभाई थी. फ़्रांस ने वर्ष 1998 में अपनी धरती पर पहली बार विश्व कप जीता था. हालाँकि खिलाड़ी के रूप में भी ज़ैके ने बेहतरीन खेल दिखाया था. लेकिन उनका योगदान कोच के रूप में ज़्यादा रहा.

वर्ष 1993 में उन्हें कोच के रूप में फ़्रांसीसी टीम की ज़िम्मेदारी मिली थी. शुरू में उन्हें कोच बनाए जाने की काफ़ी आलोचना हुई थी. लेकिन बाद में उन्होंने कोच के रूप में अपनी उपयोगिता साबित कर दी.

मारियो ज़गालो

ज़गालो उन लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने फ़ुटबॉल खिलाड़ी और फ़ुटबॉल कोच- दोनों रूपों में अपनी काबलियत साबित की. उन्होंने एक खिलाड़ी, एक कोच और एक सहायक कोच के रूप में ब्राज़ील के लिए विश्व कप जीतने में सफलता पाई.

ये अपने आप में एक अनोखा रिकॉर्ड है. ब्राज़ील ने जब 1958 और 1962 में विश्व कप जीता, उस समय ज़गालो खिलाड़ी के रूप में टीम का हिस्सा थे. वर्ष 1970 में ब्राज़ील ने उनके कोच रहते विश्व कप जीता. जबकि 1994 में ब्राज़ील की ख़िताबी जीत के समय वे सहायक कोच थे.

लुईस फिलिप स्कोलारी

स्कोलारी भी दुनिया के मशहूर फ़ुटबॉल कोच में से एक हैं. उनके कोच रहते ब्राज़ील ने वर्ष 2002 में पाँचवीं बार ख़िताबी जीत हासिल की थी.

लेकिन 2002 के विश्व कप के बाद वे पुर्तगाल की टीम से जुड़ गए. यूरो 2004 में उन्होंने पुर्तगाल को फ़ाइनल तक पहुँचाया. वर्ष 2006 के विश्व कप में पुर्तगाल की टीम चौथे स्थान पर रही.







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