Sunday, September 18, 2011

२००९ का सार

शपथ ग्रहण करते मनमोहन सिंह

सोनिया गांधी प्रधानमंत्री न बनने के अपने फ़ैसले पर क़ायम रहीं और मनमोहन सिंह ने दूसरी बार शपथ ली

आने वाली पीढ़ियाँ जब इतिहास के पन्ने पलट कर देखेंगीं तो भारत के पन्ने पर 2009 में कुछ ऐसी घटनाएँ मिलेंगीं जिन्होंने समाज में अहम और स्थाई परिवर्तन कर दिए.

इनमें से एक है चंद्रयान अभियान. वैज्ञानिक उपलब्धियों की दृष्टि से अंतरिक्ष विज्ञान ऐसा क्षेत्र है जिस पर कोई भी भारतीय गर्व कर सकता है. चंद्रयान का सफल अभियान भी ऐसी उपलब्धियों में से एक था. चंद्रयान ने न केवल चंद्रमा के क़रीब पहुँचने में सफलता पाई बल्कि उसने उल्लेखनीय आँकड़े भी जुटाए.

इन आँकड़ो में एक अहम जानकारी यह भी थी कि चंद्रमा पर पानी हो सकता है. बाद में नासा के प्रयोगों ने इन आंकड़ों की पुष्टि की.

इसके अलावा भारत ने इसी साल एक साथ सात उपग्रह अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करने में सफलता पाई.

दूसरा है दिल्ली हाईकोर्ट का फ़ैसला जिसमें समलैंगिक संबंधों को वैधता प्रदान कर दी गई. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फ़ैसले को बदलने से इनकार कर दिया. जिस देश में वैलेंटाइन्स डे मनाने पर आपत्ति की जाती रही है और पब में लड़कियों की मौजूदगी बर्दाश्त न हो रही हो. वहीं एक अदालत ने कह दिया कि समलैंगिक होना एक व्यक्तिगत फ़ैसला है और अधिकार भी.

भूलना नहीं चाहिए कि इसी समय में अदालतों ने बिना विवाह साथ रहने, यानी ‘लिव-इन’ संबंधों को भी ग़लत मानने से इनकार कर दिया. उसने ऐसे रिश्तों में लड़की को पत्नी की तरह अधिकार देने की भी वकालत की. इन फ़ैसलों ने कुंद होते दिख रहे भारतीय समाज में नई पीढ़ी के लिए स्वतंत्रता की खिड़कियाँ खोली हैं.

एक महत्वपूर्व परिवर्तन इस साल आया सर्वोच्च न्यायालय के गलियारों में.

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पहले नहीं चाहते थे कि संपत्ति का ब्यौरा दिया जाए

पहली बार सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने माना कि समाज के प्रति उनकी भी जवाबदेही है. लगातार बढ़ते दबावों के बाद आख़िर सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक कर दिया. इस क़दम ने आशा जगाई कि भारतीय लोकतंत्र के स्तंभ धीरे-धीरे ही सही, थोड़ा-थोड़ा करके ही सही जवाबदेह और पारदर्शी हो रहे हैं.

इसी साल देश ने देखा कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के बालाकृष्णन ने किस तरह न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर चिंता जताई.

साल बीतते-बीतते कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनाकरण की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति को जिस तरह से चुनौती मिली और इस प्रक्रिया को जिस तरह रोकना पड़ा, उसने भी एक आशा जगाई है.

कहना होगा कि सूचना का अधिकार इस साल समाज के हाथों में एक धारदार हथियार की तरह चमकता दिखाई दिया और उसने कार्यपालिका को भी जवाबदेह होने पर थोड़ा ही सही मजबूर तो किया ही है.

यूपीए की दूसरी पारी

वर्ष 2009 के पन्नों पर रतन टाटा की वह ज़िद भी दर्ज रहेगी, जिसका नाम नैनो है. दुनिया की सबसे सस्ती कार नैनो को उन्होंने बहुत अड़चनों के बाद भी साकार करके दिखा दिया.

इस छोटी सी कार ने एकाएक दुनिया भर की कार कंपनियों के सामने एक चुनौती रख दी है. यह समय बताएगा कि यह कार आम जनता तक कितनी पहुँची और वह आम जनता वास्तव में कितनी आम थी. लेकिन रतन टाटा अपने वादे पर खरे उतरे हैं.

जो लोग अपने वादों पर खरे नहीं उतरे, यह साल उनको भी सबक सीखाने वाला साल रहा. यानी आम चुनाव का वर्ष.

राहुल गांधी

राहुल गांधी ने कांग्रेस के भीतर संगठन चुनाव को लोकतांत्रिक ढंग से करवाने का फ़ैसला किया है

हालांकि मई 2009 में हुए लोकसभा के चुनाव के नतीजे 1977, 1984 या 1989 की तरह ऐतिहासिक नहीं माने जाएँगे, लेकिन इन नतीजों ने फिर भी छोटी-छोटी कई इबारतें इतिहास के पन्नों पर दर्ज कीं.

नेहरु-गांधी परिवार के दो ताक़तवर सांसदों के रहते हुए भी कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार में परिवार के बाहर के एक व्यक्ति को एक कार्यकाल पूरा करके दूसरी बार प्रधानमंत्री बनते इसी वर्ष ने देखा.

लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और मुलायम सिंह यादव को दरकिनार इसी साल ने किया. उत्तर प्रदेश के नतीजों से उत्साहित होकर एकाएक प्रधानमंत्री बनने की मायावती की हसरतों को भी इसी साल ने धोया.

राहुल गांधी, वर्ष 2009 में राजनीतिक रुप से परिपक्व हुए या नहीं इस पर मतभेद हो सकते हैं. इस बात पर भी बहस हो सकती है कि क्या वे सचमुच देश को समझना चाहते हैं. लेकिन इस बात से अधिकांश लोग सहमत होंगे कि प्रतीकों वाली अपनी राजनीति से उन्होंने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने पर मजबूर कर दिया है.

इसी साल ने वामपंथी लाल क़िले की दीवार में दरार पैदा की और उन्हें बहुत सी ज़मीनी हक़ीकतों से वाकिफ़ करवाया और भारतीय जनता पार्टी को सबक सिखाया कि नेतृत्व का संकट कैसे किसी राजनीतिक दल को हाशिए पर धकेल सकता है.

तेलंगाना का आंदोलन

लेकिन इन चुनावों से बड़ी राजनीतिक घटना बनी दिसंबर माह में उभरी तेलंगाना की राजनीति. आंध्र प्रदेश अभी अपने मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की मौत के सदमे से उबरा भी नहीं था कि अलग तेलंगाना राज्य के लिए आंदोलन फिर से शुरु हो गए.

तेलंगाना के लिए आंदोलन

राजशेखर रेड्डी चले जाने के बाद आंध्र प्रदेश में तेलंगाना का मसला फिर उठ खड़ा हुआ है

हिंसक आंदोलनों, आत्महत्याओं और आमरण अनशनों के बीच केंद्र सरकार की अपरिपक्वता भरे निर्णयों ने आंदोलन को शांत करने की बजाय और धधका दिया.

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक अलग तेलंगाना राज्य का मुद्दा कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार और राज्य की कांग्रेस सरकार के लिए गले की फाँस बना हुआ है.

राजनीतिक समाज के गले की फाँस एक और मामला बना हुआ है. वह है झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा पर दर्ज हुआ भ्रष्टाचार का मामला.

जिस देश में सरकारी आँकड़े कह रहे थे कि 80 प्रतिशत जनता को प्रतिदिन 20 रुपए से भी कम पर गुज़ारा करना पड़ता है और देश की 37 फ़ीसदी जनता ग़रीबी रेखा से नीचे चली गई है. वहीं इस बात पर सहज भरोसा नहीं होता कि एक निर्दलीय विधायक से मुख्यमंत्री बने मधु कोड़ा ने अपने छोटे से कार्यकाल में अपने मुट्ठी भर साथियों के साथ मिलकर चार हज़ार करोड़ रुपयों का वारा-न्यारा कर लिया.

कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा के समर्थन से मुख्यमंत्री बने मधु कोड़ा के मामले ने भारतीय राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार पर बहुत से सवाल उठाए हैं.

सवाल तो चंडीगढ़ की रुचिका के मामले में 19 बरस बाद आए फैसले ने भी उठाए हैं. एक लड़की को आत्महत्या के लिए बाध्य करने और पूरे परिवार को सताने के बाद एक पुलिस अधिकारी को न केवल महानिदेशक बना दिया गया बल्कि अदालत ने सिर्फ़ छह महीने की सज़ा देकर छोड़ दिया.

सज़ा सुनाए जाने के बाद एसपीएस राठौर जिस तरह मुस्कुराते हुए बाहर आए उससे एक बार फिर पूछा जा रहा है कि क्या इसे न्याय कहा जा सकता है?

जेसिका लाल, नितीश कटारा और प्रियदर्शिनी मट्टू की तरह एक और मामला बरस बीतते-बीतते सुर्खियों में छा गया है और इसने नागरिक समाज को एक बार फिर आंदोलित कर दिया है.

क़साब

क़साब का अब कहना है कि अब पुलिस उसे फँसा रही है

बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के 17 बरस बाद आई लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट ने किसी को नहीं चौंकाया. अलबत्ता एक सवाल ज़रुर पूछा गया कि ऐसी रिपोर्ट के लिए 17 बरस लगाने का क्या औचित्य था?

पिछले साल, यानी 2008 में मुंबई पर हुए हमलों के बाद एकमात्र जीवित बचे हमलावर अजमल क़साब पर मुक़दमा चलता रहा और भारत पाकिस्तान को सबूत पर सबूत भेजता रहा. भारत ने पाकिस्तान को आठ दस्तावेज़ सौंपे और हर बार पाकिस्तान ने कहा कि भारत ठोस सबूत नहीं दे रहा है.

उधर क़साब ने पहले तो अदालत में अपना जुर्म क़बूल कर लिया लेकिन अंत में वह अपने पहले के बयानों से पलट गया. उम्मीद है कि नए साल में इस मामले पर फ़ैसला आ जाएगा.

लेकिन देखना यह भी है कि मुंबई हमलों पर प्रधान कमेटी की रिपोर्ट पर सरकार का फ़ैसला कब आता है और क्या वह उन अफ़सरों को दंड देगी जिन्हें रिपोर्ट में दोषी पाया गया है.

इस साल ने एक भारतीय वैज्ञानिक वेंकटरामन रामकृष्णन को रसायन शास्त्र का नोबेल ग्रहण करते देखा और भारतीय वैज्ञानिकों को जीन मैप बनाने में सफलता पाते हुए भी देखा. लेकिन यह निराशा बनी रही कि देश के बड़े हिस्से में अभी भी लोग मलेरिया और डायरिया से मर रहे हैं.

इसी साल ने तीन भारतीयों, एआर रहमान, गुलज़ार और रसूल पोकुट्टी को ऑस्कर पाते देखा और भारतीय फ़िल्म निर्माताओं-निर्देशकों को गिनती की अच्छी और बहुत सारी ख़राब फ़िल्में बनाते देखा.

कई पन्ने जो़ड़े इतिहास में 2009 ने

चुनाव ने बनाए कई नए समीकरण

सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह

सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच तालमेल ने कारगर भूमिका निभाई

वर्ष 2009 में हुए आम चुनाव कई मायनों में अहम थे.

एक तो इसलिए क्योंकि इसने कांग्रेस के पक्ष में ऐसे नतीजे दिए जिसकी अपेक्षा ख़ुद कांग्रेस को नहीं थी. 2004 में कांग्रेस को 145 सीटें मिली थीं और 2009 में यह बढ़कर 206 हो गईं.

दूसरा यह कि इन परिणामों ने कांग्रेस को ऐसे सभी साथियों से छुटकारा दिलवा दिया जिन्होंने चुनाव के पहले या चुनाव के दौरान परेशानी में डाला था. इसमें लालू प्रसाद यादव से लेकर मुलायम सिंह यादव और रामविलास पासवान तक कई लोग थे.

लेकिन कांग्रेस को सबसे अधिक सुकून देने वाली ख़बर आई पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश से. वामपंथी दलों की ऐतिहासिक हार हुई और वे 35 सीटों से 15 सीटों तक जाकर सिमट गए. तृणमूल कांग्रेस के साथ कांग्रेस ने वहाँ राजनीति की एक नई पारी शुरु करने के संकेत दिए. दूसरा मायावती की माया को झुठलाते हुए कांग्रेस ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश में अपने पैरों पर खड़े होकर दिखा दिया. कांग्रेस का यह फैसला भी सही साबित हुआ कि उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी से समझौता न करके अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ा जाए.

हालांकि अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ने का कांग्रेस का फ़ैसला सीटों की संख्या के लिहाज से बिहार में उत्तर प्रदेश की तरह प्रभावकारी साबित नहीं हुआ. लेकिन उसने वहाँ अपने पुराने साथियों लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल और रामविलास पासवान के लोकजन शक्ति पार्टी को राजनीतिक हाशिए पर ज़रुर खड़ा कर दिया. और उसने अपने वोटों का प्रतिशत चार से बढ़ाकर 10 कर लिया.

इसका असर यह हुआ कि लालू प्रसाद को जहाँ सिर्फ़ चार सीटें मिल सकीं वहीं रामविलास पासवान ख़ुद भी चुनाव हार गए और उनकी पार्टी को एक भी सीट नहीं मिल सकी. फ़ायदे में रहे नीतीश कुमार जिनकी पार्टी को 20 सीटें मिलीं और उनकी सहयोगी भाजपा को 12.

कांग्रेस को उत्तर प्रदेश के अलावा जिस राज्य से सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ वह था आंध्र प्रदेश. जैसा कि सोनिया गांधी सोनिया गांधी ने ख़ुद कहा कि जब तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएसआर यानी राजशेखर रेड्डी ने कहा कि वे कांग्रेस को अधिकतम सीटें जीतकर देंगे तो किसी ने भरोसा नहीं किया था लेकिन नतीजों ने उन्हें सही साबित किया. न केवल उन्होंने राज्य में दूसरी बार सत्ता हासिल की, उन्होंने प्रदेश की 42 सीटों में से 33 कांग्रेस को दिलवाईं.

वहाँ चंद्राबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी को सिर्फ़ छह सीटों पर ही संतोष करना पड़ा. लेकिन यह सिर्फ़ चंद्राबाबू नायडू भर की स्थिति नहीं थी. उन्होंने जिन लोगों के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बनाया था वे सब हाशिए पर चले गए. इसमें मायावती थीं और वामपंथी दल. चुनाव से पहले यह मोर्चा अपने आपको ‘किंग मेकर’ की भूमिका में देख रहा था लेकिन परिणामों ने उनके आकलनों को धो दिया.

आडवाणी को नकारा मतदाताओं ने

लालकृष्ण आडवाणी

लालकृष्ण आडवाणी के लिए वर्ष कोई अच्छी ख़बर नहीं लेकर आया

इस चुनाव में मतदाताओं ने लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री की तरह स्वीकार करने से इनकार कर दिया और भाजपा को 138 सीटों की जगह सिर्फ़ 116 सीटें ही मिल सकीं.

इस तरह कांग्रेस और भाजपा के बीच 2004 के आम चुनावों में जो फ़ासला सिर्फ़ सात सीटों का था वह इस बार 68 सीटों का हो गया.

इन परिणामों ने भाजपा में चल रही उथल पुथल को सतह पर ला दिया और वर्ष के अंत तक लालकृष्ण आडवाणी को न केवल लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ना पड़ा, बल्कि राजनाथ सिंह को भी अध्यक्ष का पद छोड़कर एक अपरिचित से नेता नितिन गडकरी को कार्यभार सौंपना पड़ा.

एनडीए में शामिल भाजपा के कुछ साथियों का साथ छूटना भी उसके लिए भारी पड़ा. मसलन उड़ीसा में बीजू जनता दल ने भाजपा का साथ छोड़ा और राज्य की 21 सीटों में से 13 सीटें जीत लीं.

भाजपा को वर्ष 2004 में जहाँ सात सीटें मिली थीं इस बार भाजपा वहाँ खाता भी नहीं खोल सकी. कांग्रेस को इसका सीधा लाभ मिला और उसने पिछली बार की दो सीटों को बढ़ाकर सात कर लिया.

मुद्दे

राजनीतिक विश्लेषक अभी भी विश्लेषण कर रहे हैं कि कौन सी वजहें थीं जिनकी वजह से कांग्रेस को ऐसी जीत मिली जिसकी अपेक्षा वो ख़ुद नहीं कर रही थी.

जब पिछले चुनावों के बाद यूपीए बना और सोनिया गांधी ने ख़ुद प्रधानमंत्री न बनकर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया तो लोगों को लगा था कि तालमेल मुश्किल होगा क्योंकि शक्ति का सबसे बड़ा केंद्र वे ख़ुद हैं. लेकिन पिछले कार्यकाल में दोनों के बीच तालमेल से लोगों को सुखद आश्चर्य हुआ

मानिनी चटर्जी, पत्रकार

कांग्रेस ने ख़ुद कहा कि यह स्थायित्व के लिए मिला वोट है लेकिन बहुत से विश्लेषक इसे लेकर एकमत नहीं होते क्योंकि गठबंधन की सरकारों का सिलसिला अभी ख़त्म होता नहीं दिख रहा है.

लेकिन इस बात पर दो मत नहीं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की छवि ने सकारात्मक भूमिका निभाई, वहीं यूपीए चेयरमैन के रुप में सोनिया गांधी के कामकाज के ढंग ने भी लोगों को लुभाया.

वरिष्ठ पत्रकार मानिनी चटर्जी कहती हैं, “जब पिछले चुनावों के बाद यूपीए बना और सोनिया गांधी ने ख़ुद प्रधानमंत्री न बनकर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया तो लोगों को लगा था कि तालमेल मुश्किल होगा क्योंकि शक्ति का सबसे बड़ा केंद्र वे ख़ुद हैं. लेकिन पिछले कार्यकाल में दोनों के बीच तालमेल से लोगों को सुखद आश्चर्य हुआ.”

उनका कहना है, “मनमोहन सिंह की भले और ईमानदार आदमी की छवि ने भी बहुत फ़ायदा दिया तो सोनिया गांधी ने उन्हें जो इज़्ज़त दी उसने भी अच्छा संदेश दिया.”

भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने मनमोहन सिंह पर सीधा हमला किया और लगता है कि यह भी उनके ख़िलाफ़ गया.

दूसरी ओर यूपीए सरकार की योजनाओं और कार्यों का भी असर चुनाव परिणामों पर पड़ा.

हाल ही में एक आकलन देखने में आया है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने किसानों के 60 हज़ार करोड़ रुपए के कर्ज़ माफ़ करने की घोषणा की थी और जिन राज्यों में इस पर ठीक तरह से अमल हुआ वहाँ चुनावों में कांग्रेस को फ़ायदा मिला.

मानिनी चटर्जी मानती हैं कि ग्रामीण रोजग़ार गारंटी क़ानून का भी लाभ चुनावों में मिला क्योंकि इसने पहली बार लोगों को रोज़गार का आश्वासन दिया.

मधु कोडा

मधु कोडा पर भ्रष्टाचार करके चार हज़ार करोड़ रुपए की संपत्ति जमा करने का आरोप है

उनका कहना है कि राहुल गांधी की बातें शुरु में बचपने की बातें लग रहीं थीं लेकिन उत्तर प्रदेश में 20 सीटों ने साबित किया कि उनके करिश्मे ने भी चुनाव परिणामों पर असर डाला.

लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान को वर्ष 2009 के चुनाव ने जिस तरह से हाशिए पर डाला है उसने इन नेताओं को मजबूर किया कि वे अपनी राजनीति पर पुनर्विचार करें. हालांकि मुलायम सिंह का प्रदर्शन बहुत बुरा नहीं था लेकिन वह पिछली बार की तुलना में काफ़ी कम सीटें जीत सके.

वर्ष के अंत में फ़िरोज़ाबाद में हुए उपचुनाव में मुलायम सिंह की बहू डिंपल यादव को जिस तरह से कांग्रेस के राज बब्बर ने मात दी उसने मुलायम सिंह को भी संकेत दिए हैं कि वे भी अपनी राजनीति पर नज़र डालें.

हालांकि मानिनी चटर्जी कहती हैं कि ये नेता ज़मीन से उठकर आए नेता हैं और इन सबको ज़मीनी राजनीति का ख़ासा अनुभव है इसलिए यह कहना की उनकी राजनीति ख़त्म हो रही है, ग़लत होगा और मौक़ा मिलने पर वे फिर उभरकर सामने आएँगे.

कुल मिलाकर वर्ष 2009 ने सकारात्मक और जनपरक राजनीति के प्रति लोगों के रुझान को रेखांकित किया और बहुत से क्षत्रपों का भ्रम दूर किया लेकिन इसी साल ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का उभार देखा और झारखंड में मधु कोड़ा की अकूत संपत्ति का पता भी दिया.


भारतीय मूल के वेंकटरामन को नोबेल सम्मान

वेंकटरामन रामकृष्णन

वेंकटरामन रामकृष्णन इस समय ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से जुड़े हैं

भारतीय मूल के वैज्ञानिक वेंकटरामन रामकृष्णन और दो अन्य वैज्ञानिकों को इस वर्ष केमिस्ट्री के लिए नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है.

अमरीकी नागरिक डॉक्टर वेंकटरामन को इसराइली महिला वैज्ञानिक अदा योनोथ और अमरीका के थॉमस स्टीज़ के साथ सम्मान के लिए चुना गया है.

बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद के साथ बातचीत में डॉक्टर रामकृष्णन ने कहा कि उन्हें नोबेल मिलने से बहुत खुशी है पर पुरस्कारों के मिलने के आधार पर अच्छे काम की पहचान करने का पैमाना ग़लत है.

उन्होंने कहा, "मीडिया का ज़्यादा ध्यान वैज्ञानिकों के काम पर तब जाता है जब उन्हें पश्चिम में मिलने वाले बड़े सम्मान या पुरस्कार मिलने लगते हैं. यह ग़लत तरीका है. कोशिश होनी चाहिए कि हम अपने यहाँ काम कर रहे वैज्ञानिकों, उनके काम को जाने और उसके बारे में लोगों को बताएं."

भारत में जन्मे वेंकटरामन इस समय ब्रिटेन के प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से जुड़े हुए हैं.

57 वर्षीय वेंकटरामन रामकृष्णन कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की एमआरसी लेबोरेट्रीज़ ऑफ़ म्यलूकुलर बायोलोजी के स्ट्रकचरल स्टडीज़ विभाग के प्रमुख वैज्ञानिक हैं.

डॉक्टर रामकृष्णन के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने रिबोसोम्ज़ का गहन अध्ययन किया था, रिबोसोम्ज़ शरीर की कोशिश के भीतर प्रोटीन बनाते हैं.

इन वैज्ञानिकों ने विज्ञान के क्षेत्र में बुनियादी योगदान किया है और उनके इस सराहनीय कार्य की वजह से बहुत सारी बीमारियों का इलाज एंटी बायोटिक्स के ज़रिए करने में भारी मदद मिली है

नोबेल सम्मान समिति

तीनों वैज्ञानिकों ने त्रिआयामी चित्रों के ज़रिए दुनिया को समझाया कि किस तरह रिबोसोम्ज़ अलग-अलग रसायनों के साथ प्रतिक्रिया करते हैं, इसके लिए उन्होंने एक्सरे क्रिस्टलोग्राफ़ी का सहारा लिया जो रिबोसोम्ज़ की हज़ारों गुना बड़ी छवि सामने लाता है.

नोबेल सम्मान समिति का कहना है कि "इन वैज्ञानिकों ने विज्ञान के क्षेत्र में बुनियादी योगदान किया है और उनके इस सराहनीय कार्य की वजह से बहुत सारी बीमारियों का इलाज एंटी बायोटिक्स के ज़रिए करने में भारी मदद मिली है".

अदा योनोथ इसराइल के विज़मैन इंस्टीट्यूट में स्ट्रकचरल बायोलॉजी की प्रोफ़ेसर हैं और रसायन विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार पाने वाली चौथी महिला हैं, 1964 के बाद से पहली बार किसी महिला को यह सम्मान मिला है.

तीसरे वैज्ञानिक थॉमस स्टीज़ का संबंध अमरीका के येल विश्वविद्यालय से है.

तीनों वैज्ञानिकों के बीच पुरस्कार की राशि बराबर-बराबर बाँटी जाएगी, यह पुरस्कार 10 दिसंबर को दिया जाएगा.

लोकसभा चुनाव में यूपीए की बड़ी जीत

पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव के नतीजों और रुझानों में कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) को बड़ी जीत मिली है.

कांग्रेस कार्यकर्ता

लोकसभा चुनाव में मिली जीत के बाद सोनिया गांधी के आवास के बाहर जश्न मनाते कार्यकर्ता

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है और भाजपा ने हार स्वीकार भी कर ली है.

सोनिया गांधी के आवास 10 जनपथ पर मौजूद बीबीसी संवाददाता अविनाश दत्त के मुताबिक़ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यूपीए की जीत पर देश की जनता को धन्यवाद दिया है और कहा है कि ये सरकार के अच्छे काम का इनाम है.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आवास पर आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने कहा, "भारत के लोगों ने बड़ी बुलंदी से अपनी बात कही है. सांप्रदायिक घृणा से मुक्त प्रशासन या सरकार के लिए उन्होंने मत दिया है."

मनमोहन सिंह ने कहा कि वे कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को मंत्रिमंडल का सदस्य बनने के लिए कहेंगे.

दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने हार स्वीकार की है और कांग्रेस पार्टी को बधाई दी है. पार्टी प्रवक्ता अरुण जेटली ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि लालकृष्ण आडवाणी ने विपक्ष के नेता का पद छोड़ने की मंशा ज़ाहिर की है. लेकिन पार्टी ने इसे मंज़ूरी नहीं दी है.

ताज़ा जानकारी के मुताबिक़ यूपीए 147 सीटों पर जीत हासिल कर चुकी है और 112 सीटों पर गठबंधन के उम्मीदवार आगे चल रहे हैं.

एनडीए को अभी तक 90 सीटें मिली हैं और 72 सीटों पर उसके उम्मीदवार आगे हैं.

जीत का जश्न

यूपीए की बढ़त की ख़बर आते ही नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में जश्न का माहौल हो गया. जम कर नारेबाज़ी हुई, मिठाइयाँ बाँटी गई और पटाखे छोड़े गए.

कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने इसे शानदार जीत बताया है. ख़ुशी से गदगद नज़र आ रहे केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के नेता ऑस्कर फ़र्नांडीस ने कहा- मनमोहन सिंह देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे.

मनमोहन सिंह देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे

ऑस्कर फ़र्नांडीस, कांग्रेस नेता

कांग्रेस मुख्यालय से अलग भाजपा मुख्यालय पर निराशा का आलम है. पार्टी प्रवक्ता वेंकैया नायडू ने माना कि पार्टी नतीजों से निराशा हुई है.

उन्होंने कहा, "हम नतीजों की समीक्षा करेंगे. लेकिन मैं इससे सहमत हूँ कि हमें निराशा हुई है."

कौन जीता कौन हारा

जिन उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है, उनमें प्रमुख हैं पटना साहिब से भाजपा उम्मीदवार शत्रुघ्न सिन्हा, विदिशा से भाजपा नेता सुषमा स्वराज, छिंदवाड़ा से कांग्रेस नेता कमलनाथ, अमृतसर से भाजपा नेता नवजोत सिंह सिद्धू, श्रीनगर से नेशनल कॉन्फ़्रेंस के फ़ारूख़ अब्दुल्लाह, अजमेर से कांग्रेस के सचिन पायलट, मुंबई नॉर्थ सेंट्रल से कांग्रेस की प्रिया दत्त.

कांग्रेस कार्यकर्ता

लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी हार स्वीकार कर ली है

रामपुर सीट से समाजवादी पार्टी की जयाप्रदा चुनाव जीत गई हैं. प्रजाराज्यम पार्टी के प्रमुख अभिनेता चिरंजीवी तिरुपति से चुनाव जीते हैं.

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा सिंहभूमि से जीत गए हैं. वे निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में खड़े थे. पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा भी हासन से चुनाव जीत गए हैं.

पूर्व क्रिकेटर मोहम्मद अज़हरुद्दीन मुरादाबाद से जीत गए हैं. कोलकाता दक्षिण से तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बैनर्जी भी जीत गई हैं.

भाजपा के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह दार्जीलिंग से चुनाव जीत गए हैं. भागलपुर से भाजपा के सैयद शाहनवाज़ हुसैन जीत गए हैं. हिमाचल प्रदेश की मंडी संसदीय सीट से पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता वीरभद्र सिंह चुनाव जीत गए हैं.

तिरुअनंतपुरम से कांग्रेस के शशि थरूर ने जीत हासिल की है. ग्वालियर से भाजपा की यशोधरा राजे सिंधिया जीत गई हैं. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह एटा से चुनाव जीत गए हैं.

वे निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे थे. समाजवादी पार्टी उनका समर्थन कर रही थी. राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह बागपत से जीत गए हैं.

लखनऊ से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार लालजी टंडन विजयी हुए हैं. तो भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ग़ाज़ियाबाद से चुनाव जीत गए हैं.

कई दिग्गजों को इस चुनाव में भारी झटका लगा है. वर्षों से हाजीपुर की सीट से चुनाव जीत रहे लोकजनशक्ति पार्टी के प्रमुख रामविलास पासवान हार गए हैं. यहाँ से जनता दल (यूनाइटेड) के रामसुंदर दास विजयी हुए हैं.

एक और केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी खम्मम से हार गई हैं. बाड़मेर से भाजपा के मानवेंद्र सिंह चुनाव हार गए हैं.

वामपंथी विपक्ष में बैठेंगे

सीपीएम महासचिव प्रकाश करात ने कहा कि चुनाव परिणाम पार्टी के लिए बड़ा धक्का हैं.

लोकसभा चुनाव के परिणाम पार्टी के लिए बड़ा धक्का हैं और इनकी समीक्षा की ज़रूरत है.

प्रकाश कारट, माकपा महासचिव

उनका कहना था कि पार्टी के ख़राब प्रदर्शन की गंभीर समीक्षा किए जाने की ज़रूरत है. उन्होंने स्पष्ट किया कि वामपंथी विपक्ष में बैठेंगे.

उन्होंने बताया कि सीपीएम ने 18 मई को समीक्षा के लिए बैठक आयोजित की है.

दूसरी ओर सीपीआई नेता एबी बर्धन का कहना है, '' वाममोर्चा विपक्ष में बैठेगा. बिना वजह हम क्यों कांग्रेस के साथ चिपके रहेंगे.''

बर्धन का कहना था कि पार्टी जनता के प्रश्नों को उठाएगी और नतीजों की समीक्षा के लिए उसने 19,20 और 21 मई को बैठक बुलाई है.

तीसरे मोर्चे के नेताओं ने भी चुनाव परिणामों के बाद बैठक बुलाई है.

चाल, चरित्र और चेहरे का संकट

विनोद वर्मा

विनोद वर्मा

बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

कार्यभार संभालते नितिन गडकरी

सत्ता के इस असहज हस्तांतरण को राजनाथ सिंह ने सहज बताया

भारतीय जनता पार्टी अपने आपको भारत की दूसरी राजनीतिक पार्टियों से अलग पार्टी मानती रही है और इसके लिए उसने एक चर्चित नारा दिया था, चाल, चरित्र और चेहरा.

राजनीतिक टीकाकार इस समय भाजपा की स्थिति का जिस तरह से आकलन करते हैं, उससे यह निष्कर्ष निकालना कठिन नहीं है कि वर्ष 2009 ने भाजपा के चाल, चरित्र और चेहरे तीनों को संकट में डाला है.

जहाँ तक चेहरे का सवाल है तो पार्टी के गठन के बाद से पिछले बरस तक अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी पार्टी के चेहरे रहे है. लेकिन अब अटल बिहारी वाजपेयी अपनी अस्वस्थता की वजह से पार्टी की सक्रिय गतिविधियों से अलग हो चुके हैं. लालकृष्ण आडवाणी ने एक के बाद एक कई ऐतिहासिक राजनीतिक भूलों को वजह से ख़ुद को हाशिए पर खड़ा कर लिया है.

ऐसे उदाहरण कम ही मिलेंगे कि कोई राजनेता तीन-साढ़े तीन दशक तक अपने दल के शीर्ष पर रहने के बाद अचानक अप्रासंगिक हो जाए, वह भी तब जब उसकी शारीरिक, बौद्धिक, राजनीतिक क्षमताओं में कोई दृश्य क्षरण न हुआ हो

प्रबाल मैत्र

अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के विकल्प के रुप में भाजपा ने मुरली मनोहर जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे, बंगारु लक्ष्मण, जनाकृष्णमूर्ति, वेकैंया नायडू से लेकर राजनाथ सिंह तक कई लोगों को आज़माया लेकिन किसी और चेहरे की पहचान बन ही नहीं सकी.

इस बीच भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले कल्याण सिंह और उमा भारती को पार्टी के बाहर का रास्ता दिखा दिया. एक चर्चित और विवादित नेता प्रमोद महाजन, जिसे वर्ष 2005 में पार्टी के रजत जयंती समारोह में अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना लक्ष्मण घोषित किया था, दुनिया को ही अलविदा कह गए.

अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पसंद के रुप में नितिन गडकरी को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रुप में लाया गया है लेकिन इस चेहरे का सबसे बड़ा संकट यह है कि उन्हें महाराष्ट्र से बाहर कम ही लोग पहचानते हैं. अब भाजपा का राष्ट्रीय चेहरा ऐसा व्यक्ति है, जिसने अध्यक्ष का पद संभालते ही कहा, “मैंने पिछले पाँच सालों में एक भी रात दिल्ली में नहीं गुज़ारी है.”

देखना होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नितिन गडकरी को पहचान दिलाने में कितनी सफलता हासिल कर पाता है.

चाल और चरित्र

वसुंधरा राजे सिंधिया

वसुंधरा ने इस्तीफ़ा देने से पहले लोगों को दिखा दिया कि पार्टी के भीतर लोकतंत्र की स्थिति कितनी दयनीय है

चाल से ही चरित्र का निर्धारण होता है. लेकिन 1998 से 2004 तक केंद्रीय सत्ता पर बने रहने और कई राज्यों में अपनी सत्ता हासिल करने के बाद भाजपा के नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं को चाल और चरित्र को लेकर निराश ही किया.

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण की जो तस्वीरें लोगों ने अपने टेलीविज़न पर देखी वह बहुत समय तक लोगों को नहीं भूलेगी. संघ से पार्टी में महासचिव के तौर पर नियुक्त किए गए संजय जोशी पर लगे चारित्रिक पतन के आरोपों को कार्यकर्ताओं ने किस तरह देखा होगा, कहना कठिन नहीं है.

हिंदुत्व को लेकर पार्टी की पहचान बनाने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने भले ही अपनी समझ से एक सोची समझी चाल चली थी और मोहम्मद अली जिन्ना को धर्म निरपेक्ष घोषित किया था लेकिन इस एक ग़लत चाल ने देश में भाजपा के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोगों के मन में उनके चरित्र को बदल कर रख दिया.

ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी पर पत्रकार प्रबाल मैत्र की टिप्पणी प्रासंगिक लगती है, जब वे कहते हैं, “ऐसे उदाहरण कम ही मिलेंगे कि कोई राजनेता तीन-साढ़े तीन दशक तक अपने दल के शीर्ष पर रहने के बाद अचानक अप्रासंगिक हो जाए, वह भी तब जब उसकी शारीरिक, बौद्धिक, राजनीतिक क्षमताओं में कोई दृश्य क्षरण न हुआ हो.”

अटल बिहारी वाजपेयी

कहना कठिन है कि भाजपा को वाजपेयी जैसे क़द का कोई नेता कब मिल सकेगा

पूरे देश ने देखा कि अपने अनुशासन पर गर्व करने वाली पार्टी में लोगों ने लालकृष्ण आडवाणी पर सार्वजनिक रुप से नाराज़ होते उमा भारती को देखा, दूसरी पीढ़ी के नेताओं को मीडिया के ज़रिए एक दूसरे की टांग खींचते हुए देखा और भाजपा के भीतर भी वही गुटबाज़ी देखी जिसके लिए भाजपा दूसरी पार्टियों पर कीचड़ उछालती रही है.

अगर सिर्फ़ वर्ष 2009 की बात करें तो भी उदाहरण कम नहीं है.

जिन्ना को सेक्युलर बताने वाले लालकृष्ण आडवाणी को आम चुनावों में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तक बना दिया गया लेकिन इसी आरोप में पार्टी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया.

राज्य में पार्टी की हार के लिए ज़िम्मेदार ठहराकर बीसी खंडूरी को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया और पार्टी नेतृत्व की किरकिरी की क़ीमत पर भी वसुंधरा राजे सिंधिया को राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद छोड़ने पर मजबूर किया गया. लेकिन महाराष्ट्र में पार्टी की क़रारी हार के बाद राज्य इकाई के अध्यक्ष नितिन गडकरी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया.

जसवंत सिंह, लालकृष्ण आडवाणी और राजनाथ सिंह

जसवंत सिंह को पार्टी से निकालने के लिए नियमों को भी दरकिनार कर दिया गया

बीता साल इस बात का गवाह रहा कि पार्टी उत्तर प्रदेश में किस तरह अप्रासंगिक हो रही है, किस तरह वह महाराष्ट्र में लगातार तीसरी बार सत्ता के क़रीब पहुँचने में विफल रही है और किस तरह बिहार में उसकी स्थिति लगातार कमज़ोर होती जा रही है. दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक में पहली बार सत्ता हासिल करने के बाद, मुख्यमंत्री बी येदियुरप्पा को पार्टी के दूसरे नेताओं से मिली खुली चुनौती पर राष्ट्रीय नेतृत्व की बेबसी का गवाह भी यही साल बना.

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में पार्टी की जीत ज़रुर हुई लेकिन दिल्ली तीसरी बार कांग्रेस में झोली में चली गई. आंध्र में तेलुगुदेशम पार्टी पहले ही छिटक गई थी लेकिन उड़ीसा में बीजू जनता दल का दामन छोड़ देना पार्टी के लिए बेहद नुक़सानदेह साबित हुआ है.

अरूण शौरी से लेकर यशवंत सिन्हा तक कई नेता शीर्ष नेतृत्व की शिकायत करते रहे और इसे सार्वजिक भी करते रहे लेकिन पार्टी उन्हें चेतावनी देने के अलावा कुछ नहीं कर सकी.

यह कहना ग़लत होगा कि भाजपा कभी भी संघ के प्रभाव से मुक्त था लेकिन आभासिक तौर पर ही सही भाजपा ने एक स्वतंत्र राजनीतिक दल की तरह बर्ताव करना शुरु कर दिया था. वर्ष 2009 इस बात का भी गवाह रहेगा कि एक बार फिर भाजपा एक कठपुतली बन गई जिसका कोई स्वतंत्र चरित्र नहीं है और उसकी हर चाल संघ मुख्यालय से नियंत्रित है.

मुख्य विपक्षी दल भाजपा की यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छी स्थिति नहीं है, इससे कौन इनकार कर सकता है.

कौन हैं नितिन गडकरी?

कार्यभार संभालते नितिन गडकरी

नितिन गडकरी के सामने बड़ी चुनौतियाँ हैं

नितिन गडकरी अब भारत के सबसे बड़े विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए हैं.

उन्होंने निवर्तमान अध्यक्ष राजनाथ सिंह की जगह ली है. वे भाजपा के नौंवें राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं.

वे भाजपा के अब तक के सबसे युवा अध्यक्ष हैं.

राजनीतिक गलियारों माना जा रहा था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) इस पद के लिए उनके नाम पर पहले ही मुहर लगा चुका था. इसलिए उनके अध्यक्ष बनने की घोषणा को सिर्फ़ औपचारिकता माना जा रहा था.

गडकरी की हैसियत राष्ट्रीय स्तर पर बहुत जानी पहचानी नहीं है, पर वो आरएसएस के चहेते माने जाते हैं क्योंकि वो संघ के एक प्रतिबद्ध और निष्ठावान स्वयंसेवक हैं. उनके पिता जहाँ संघ के एक सामान्य कार्यकर्ता थे वहीं माता एक प्रसिद्ध प्रचारक थीं.

52 वर्षीय नितिन गडकरी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से पहले महाराष्ट्र में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे. वो महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य भी हैं.

उनका जन्म महाराष्ट्र के नागपुर ज़िले में एक ब्रह्मण परिवार में हुआ. वो तीन बच्चों के पिता हैं. उन्होंने एलएलबी और एमकॉम तक की शिक्षा ली है.

गडकरी ने छात्र जीवन में ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़कर अपने राजनीतिक सफ़र की शुरुआत की. अपने ऊर्जावान व्यक्तित्व और सब को साथ लेकर चलने की ख़ूबी की वजह से वो हमेशा अपने वरिष्ठ लागों के प्रिय रहे हैं.

विवादों से भी उनका रिश्ता रहा है. लोक सभा के चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ख़िलाफ कथित आपत्तिजनक बयान देने के लिए वो विवादों में घिरे और चुनाव आयोग ने उनके ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया था.

ऊर्जावान व्यक्तित्व

नितिन गडकरी

नितिन गडकरी को राष्ट्रीय राजनीति का कोई अनुभव नहीं है

1995 में वो महाराष्ट्र में शिव सेना- भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार में लोक निर्माण मंत्री बनाए गए और चार साल तक मंत्री पद पर रहे. मंत्री के रुप में वो अपने अच्छे कामों की वजह से ज़बर्दस्त तारीफ़ भी बटोर चुके हैं.

1989 में वो पहली बार विधान परिषद के लिए चुने गए. हालाँकि उससे पहले 1983 में वो चुनाव हारे भी थे. वो पिछले 20 वर्षों से विधान परिषद के सदस्य हैं और आख़िरी बार 2008 में विधान परिषद के लिए चुने गए.

वो महाराष्ट्र विधान परिषद में विपक्ष के नेता भी रहे हैं.

उन्होंने अपनी पहचान ज़मीन से जुड़े एक कार्यकर्ता के तौर पर बनाई है. वो एक राजनेता के साथ-साथ एक कृषक और एक उद्योगपति भी हैं.

लेकिन जानकारों की राय में उनके अध्यक्ष के कुर्सी तक जाने की सबसे बड़ी वजह आरएसएस से नजदीकी मानी जाती है.

लोकसभा चुनावों में लगातार दूसरी बार हार के बाद भाजपा में जो उथल पुथल है उससे उबारने के लिए आरएसएस ने पार्टी के शीर्ष पदाधिकारियों के बदलने की बात कही.

और जब संघ ने यह कहा कि नया अध्यक्ष दिल्ली से नहीं होगा तो नेता की तलाश हुई जिसमें उनके साथ गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पारिक्कर का भी नाम उभरा, पर आडवाणी के बारे में पारिक्कर के विवादास्पद बयान ने उनका पत्ता काट दिया और इस तरह उनके रास्ते अधिक आसान हो गए.

आख़िर में लालकृष्ण आडवाणी की राय पर नितिन गडकरी के नाम पर आरएसएस ने अपनी मुहर लगा दी थी.

शनिवार, 19 दिसंबर को भाजपा के संसदीय बोर्ड में उन्हें सर्वसम्मति से नया अध्यक्ष चुनने के लिए सहमति बन गई.

पार्टी के संविधान के अनुरुप उनका कार्यकाल तीन साल का होगा।

आभार - बीबीसी


No comments:

Post a Comment