Friday, October 21, 2011

ग़द्दाफ़ी: क्रांतिकारी हीरो से विलेन तक

आप मुअम्मर ग़द्दाफ़ी जैसे किसी शख़्स के बारे में किस तरह बताएंगे? छह दशकों के भीतर जब वो विश्व पटल पर मौजूद रहे, उनकी शैली इतनी अनूठी और अप्रत्याशित थी कि "अपरंपरागत" और "सनकी" जैसे शब्द उनके साथ न्याय करते नहीं दिखते हैं.

अपने शासनकाल के दौरान ही वो क्रांतिकारी हीरो से अंतरराष्ट्रीय जगत में अछूत की तौर पर देखे जाने लगे, फिर उनको एक अहम पार्टनर बताया जाने लगा और पिछले कुछ दिनों में वो फिर से अछूत की श्रेणी में रखे जाने लगे.
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* मध्य पूर्व

उन्होंने अपना एक राजनीतिक चिंतन विकसित किया था, जिस पर उन्होंने एक किताब भी लिखी; जो उनकी नज़र में इस क्षेत्र में प्लेटो, लॉक और मार्क्स के चिंतन से भी कहीं आगे थी.

कई अरब और अंतरराष्ट्रीय बैठकों में वो न सिर्फ़ अपने अलग क़िस्म के लिबास की वजह से, बल्कि अपने धारधार भाषण और अपरंपरागत रंग-ढंग से भी औरों से अलग दिखे.
शुरुआती दिन

वर्ष 1969 में जब उन्होंने सैनिक तख़्ता-पलट कर सत्ता हासिल की थी, तो मुअम्मर ग़द्दाफ़ी एक ख़ूबसूरत और करिश्माई युवा फौजी अधिकारी थे.

स्वंय को मिस्र के जमाल अब्दुल नासिर का शिष्य बतानेवाले ग़द्दाफ़ी ने सत्ता हासिल करने के बाद ख़ुद को कर्नल के ख़िताब से नवाज़ा और देश के आर्थिक सुधारों की तरफ़ तवज्जो दी, जो वर्षों की विदेशी अधीनता के चलते जर्जर हालत में थी.

सत्ता पलट से पहले वो कैप्टन के पद पर थे.

अगर नासिर ने स्वेज़ नहर को मिस्र की बेहतरी का रास्ता बनाया था, तो कर्नल ग़द्दाफ़ी ने तेल के भंडार को इसके लिए चुना.

लीबिया में 1950 के दशक में तेल के बड़े भंडार का पता चल गया था लेकिन उसके खनन का काम पूरी तरह से विदेशी कंपनियों के हाथ में था जो उसकी ऐसी क़ीमत तय करते थे, जो लीबिया के लिए नहीं बल्कि ख़रीदारों को फ़ायदा पहुंचाती थी.

ग़द्दाफ़ी ने तेल कंपनियों से कहा कि या तो वो पुराने क़रार पर पुनर्विचार करें या उनके हाथ से खनन का काम वापस ले लिया जाएगा.

लीबिया वो पहला विकासशील देश था, जिसने तेल के खनन से मिलनेवाली आमदनी में बड़ा हिस्सा हासिल किया. दूसरे अरब देशों ने भी उसका अनुसरण किया और अरब देशों में 1970 के दशक की पेट्रो-बूम यानी तेल की बेहतर क़ीमतों से शुरू हुआ ख़ुशहाली का दौर प्रारंभ हुआ.
राजनीतिक चिंतक

गद्दाफ़ी का जन्म वर्ष 1942 में एक क़बायली परिवार में हुआ था और हालांकि वो एक बहुत होशियार और ज़हीन शख़्स हैं लेकिन उन्हें क़ुरान और सैन्य शिक्षा के अलावा और किसी तरह की शिक्षा हासिल नहीं हुई थी.

बावजूद इसके 1970 के आसपास उन्होंने विश्व के संबंध में एक तीसरा सिद्धांत विकसित करने का दावा किया, जिसके बारे में उनके 'ग्रीन बुक' में विस्तार से चर्चा है.

दावा किया गया है कि इस विचारधारा में एक ऐसी राह दिखाई गई है, जिसमें पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच का मतभेद ख़त्म हो जाएगा और जिसमें दबे-कुचले लोगों के राजनीतिक, आर्थिक प्रगति और सामाजिक क्रांति का रास्ता सुझाया गया है.

लेकिन जिस विचारधारा में लोगों को आज़ाद करने का दावा किया गया था, उसी के नाम पर उनकी सारी आज़ादी छीन ली गई.

ग़द्दाफ़ी का मानना था कि प्रजातंत्र एक ऐसी तानाशाही है, जिसमें बहुमत दूसरों पर अपनी मर्ज़ी चलाता है. इसीलिए उन्होंने देश भर में जन समितियों की स्थापना की जिसे उन्होंने 'जम्हीरिया' का नाम दिया.
विदेशी में बढ़े क़दम

कर्नल ग़द्दाफ़ी ने बाद में चरमपंथी संगठनों को भी समर्थन देना शुरू कर दिया, जिसमें से कई तो बाद में उनके लिए घातक सिद्ध हुए.

बर्लिन के एक नाइट क्लब पर साल 1986 में हुआ हमला इसी श्रेणी में था, जहां अमरीकी फौजी जाया करते थे, और जिस पर हमले का आरोप ग़द्दाफ़ी के माथे मढ़ा गया. हालांकि इसके कोई ठोस सबूत नहीं थे.

घटना से नाराज़ अमरीकी राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन ने त्रिपोली और बेनग़ाज़ी पर हवाई हमलों का हुक्म दिया.

हालांकि गद्दाफ़ी हमले में बच गए, लेकिन कहा गया कि उनकी गोद ली बेटी हवाई हमलों में मारी गईं.

दूसरी घटना जिसने दुनिया को हिला दिया था, वो था लॉकरबी शहर के पास पैनएम जहाज़ में बम विस्फोट, जिसमें 270 लोग मारे गए.

कर्नल ग़द्दाफ़ी ने हमले के दो संदिग्धों को स्कॉटलैंड के हवाले करने से मना कर दिया, जिसके बाद लीबिया के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र ने आर्थक प्रतिबंध लगा दिए जो दोनों लोगों के आत्मसमर्पण के बाद 1999 में हटाया गया. उनमें से एक मेगराही को उम्र क़ैद हुई.

बाद में कर्नल ग़द्दाफ़ी ने अपने परमाणु कार्यक्रम और रासायनिक हथियार कार्यक्रमों पर रोक लगाने की बात कही और पश्चिमी देशों से उनके संबंध सुधर गए.
विद्रोह

जब दिसंबर 2010 में टयूनीशिया से अरब जगत में बदलाव की क्रांति का प्रारंभ हुआ, तो उस संदर्भ में जिन देशों का नाम लिया गया, उसमें लीबिया को पहली पंक्ति में नहीं रखा गया था.

क्योंकि कर्नल ग़द्दाफ़ी को पश्चिमी देशों का पिट्ठू नहीं समझा जाता था, जो क्षेत्र में जनता की नाराज़गी का सबसे बड़ा कारण समझा जाता था.

उन्होंने तेल से मिले धन को भी दिल खोलकर बांटा था. ये अलग बात है कि इस प्रक्रिया में उनका परिवार भी बहुत अमीर हुआ था.

ग़द्दाफ़ी ने देश की प्रगति के लिए और भी कई अहम काम किए थे जैसे एक मानव-निर्मित नदी बनाकर देश के उत्तरी सूखे हिस्से में पानी पहुंचाया गया था.

इसीलिए जब क्रांति की बात शुरू हुई, तो उन्होंने कहा कि वो लोगों के साथ हैं क्योंकि उनके पास कोई सत्ता नहीं है और देश में जम्हीरिया है.

लेकिन बाद में लोगों की भारी नाराज़गी सामने आई और ज़ाहिर है कर्नल ग़द्दाफ़ी ने पूरी ताक़त से साथ उसका विरोध किया.
कर्नल गद्दाफ़ी के परिजनों की जानकारी

गद्दाफ़ी की राजनीतिक यात्रा

मुआमार गद्दाफ़ी सितंबर 1969 में सत्ता में आए थे. उन्होंने सम्राट इदरिस को एक सैनिक कार्रवाई में सत्ता से हटाया था.

उस वक़्त गद्दाफ़ी 27 साल के थे. मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासिर से प्रेरित गद्दाफ़ी उस समय अरब राष्ट्रवाद की फ़िज़ा में बिल्कुल फिट बैठे थे.
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* मध्य पूर्व

लेकिन उन्होंने इस क्षेत्र में अपने वक़्त के सभी प्रशासकों को पीछे छोड़ दिया.

क़रीब 41 साल सत्ता में रहते हुए उन्होंने सरकार चलाने की अपनी ही एक व्यवस्था खोजी जिसमें उत्तरी आयरलैंड के आईआरए जैसे हथियारबंद चरमपंथी गुटों के साथ-साथ फ़िलीपीन्स में इस्लामी कट्टरपंथी गुट अबु सय्याफ़ जैसी संस्थाओं को समर्थन दिया.

उन्होंने उत्तरी अफ़्रीका के सबसे क्रूर तानाशाह के रूप में लीबिया पर राज किया.

अपनी सत्ता के आख़िरी दिनों में स्कॉटलैंड में दिसंबर 1988 में पैन एम को उड़ाने के बाद अलग-थलग पड़े लीबिया को गद्दाफ़ी एक बार अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वीकार्य बना पाने सफल रहे थे.

लीबिया को एक बार फिर पश्चिमी देशों और कंपनियों ने देश के बड़े ईंधन भंडार की वजह से गले लगाना शुरू कर दिया था.

उनको सत्ता से हटाने वाला विद्रोह फ़रबरी 2011 में लीबिया के दूसरे बड़े शहर बेनग़ाजी से शुरू हुआ था. एक ऐसा शहर जिसे गद्दाफ़ी ने नज़रअंदाज़ किया था और जहां उनके पूरे कार्यकाल के दौरान गद्दाफ़ी पर किसी ने भरोसा नहीं किया था.
जमाहिरिया
कर्नल गद्दाफ़ी

गद्दाफ़ी जहां भी जाते अपना तंबू तान लेते थे.

कर्नल गद्दाफ़ी का जन्म एक बद्दू परिवार में सिर्त में 1946 में हुआ था.

उन्होंने हमेशा अपनी कबायली पहचान को सहेज कर रखा और वो अपने मेहमानों का स्वागत अपने टेंट में करते थे और अपनी विदेश यात्राओं के दौरान भी कई बार टेंट में ही रहते थे. गद्दाफ़ी शासन को शुरूआत में उनकी गैर-औपनिवेशिक साख और बाद में देश को ‘एक लगातार चलने वाली क्रांति’ में रखने से मिलती रही.

उन्होंने अपनी राजनीतिक विचारधारा को अपनी पुस्तक ग्रीन बुक में ‘लोगों की सरकार’ के रूप में पेश किया. साल 1977 में गद्दाफ़ी ने लीबिया को एक जमाहिरिया घोषित किया. इस शब्द का अर्थ है – ‘लोगों का राज’

सिद्धांत ये था कि लीबिया लोगों का लोकतंत्र बन गया है जिसे लोकप्रिय स्थानीय क्रांतिकारी परिषदें चला रही हैं. लेकिन वास्तव में हर प्रमुख फ़ैसला और लीबिया का धन उनके मज़बूत कब्ज़े में ही रहा.
सामाजिक सिद्धांत
गद्दाफ़ी

गद्दाफ़ी ने लीबिया में कई राजनीतिक प्रयोग किए जिन्हें उन्होंने सांस्कृतिक क्रांति का नाम दिया

गद्दाफ़ी एक दक्ष राजनीतिक व्यक्ति थे जो लीबिया की अलग-अलग जनजातीय को एक-दूसरे के विरुद्ध इस्तेमाल करते थे. इसी तरह से उन्होंने ख़ुद को एक महानायक बना लिया था.

गद्दाफ़ी लगातार लीबिया पर एक ‘पुलिस राज्य’ की तर्ज पर मज़बूत नियंत्रण बढ़ाते गए. लीबिया वासियों के लिए 1980 का दशक काफ़ी मुसीबतों भरा रहा. इस दौरान गद्दाफ़ी ने अपने सामाजिक सिद्धांतों के कई प्रयोग किए.

अपनी सांस्कृतिक क्रांति के तहत उन्होंने सभी निजी व्यवसाय बंद कर दिए और साथ ही कई किताबों को जला डाला.

उन्होंने विदेशों में रह रहे अपने विरोधियों की हत्याएं भी करवाईं. गद्दाफ़ी ने लीबिया में बोलने की स्वतंत्रता पर पुरी तरह से रोक लगाई. उन्होंने कई बार अपने विरोधियों का हिंसक दमन किया.

इसके बाद लॉकर्बी में एक हवाई जहाज़ को उड़ाने के बाद गद्दाफ़ी और लीबिया अंतरराष्ट्रीय पटल पर अलग-थलग पड़ गया. गद्दाफ़ी के आलोचकों के लिए उनका सबसे बड़ा गुनाह अपनी विदेश यात्राओं पर राष्ट्रीय धन की बर्बादी और भ्रष्टाचार रहा है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वापसी
लॉकर्बी हादसा

लॉकर्बी में हवाई जहाज़ उड़ाने की ज़िम्मेदारी लेकर गद्दाफ़ी ने पश्चिम के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की थी.

साल 2010 में साठ लाख लोगों वाले इस देश को तेल से 32 बिलियन अमरीकी डॉलर की कमाई हो रही थी. लेकिन अधिकतर लीबियाई लोगों को इस अपार धन से कोई फ़ायदा नहीं हुआ था क्योंकि उनका रहन-सहन किसी ग़रीब मुल्क़ के निवासियों जैसा ही था.

सरकार के बाहर नौकरियों की कमी के कारण लीबिया में बेरोज़गारी की दर क़रीब 30 प्रतिशत है. लीबिया के ‘समाजवाद’ में मुफ़्त शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और रियायत पर आवास एंव यातायात शामिल है लेकिन देश में वेतन बहुत ही कम है.

विदेशी निवेशों से मिलने वाला अधिकतर धन देश के चुनींदा लोगों की जेब में ही जाता रहा है. साल 1999 में गद्दाफ़ी ने लॉकर्बी विमान की उड़ाने की ज़िम्मेदारी स्वीकार कर अंतरराष्ट्रीय पटल पर वापसी की.

अमरीका पर 11 सितंबर 2001 को हुए हमले के बाद गद्दाफ़ी ने अमरीका के ‘आतंक के ख़िलाफ़ युद्ध’ का समर्थन किया. इराक़ पर साल 2003 में अमरीकी हमले के बाद लीबिया ने अपने जैविक और परमाणु हथियारों को बनाने की योजना को छोड़ने के ऐलान किया.

अपने शासन के अंतिम दिनों में उनके उत्तराधिकारी को लेकर प्रश्न उठने शुरू हो गए थे. उनके दो पुत्रों में इसके लिए खुलेआम प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई थी.

आख़िरी दिनों में उनके बड़े पुत्र सैफ़ अल-इस्लाम जो मीडिया में दिलचस्पी रखते थे, अपने छोटे भाई मुत्तसिम से पिछड़ते नज़र आ रहे थे. मुत्तसिम लीबिया के सुरक्षाबलों में एक ताक़तवर भूमिका रखते थे.

अरब जगत में पिछले डेढ़ साल से आए राजनीतिक बदलावों और आंदोलनों का असर लीबिया पर भी पड़ा और लोग साल 2011 की शुरूआत में 40 साल पुराने शासन के ख़िलाफ़ खड़े हो गए.

Saturday, October 15, 2011

पाकिस्तान में चरमपंथी गुट



अल फ़ुक़राह 1980

नेतृत्व: शेख़ मुबारक़ अली गिलानी.

कार्यालय :लाहौर, रावलपिंडी, इस्लामाबाद.

प्रशिक्षण शिविर: गढ़ई हबीबुल्ला.

कार्यक्षेत्र : भारत प्रशासित कश्मीर, अमरीका, कनाडा.

लक्ष्य :सूफ़ीवाद का प्रचार और लोगों को इस्लाम के प्रति आकर्षित करना.

अभियान : अमरीका के पोर्टलैंड शहर के चर्च में बम धमाका और विफल आत्मघाती हमलावर रिचर्ड रेड को कथित तौर पर प्रशिक्षण।

हरकत-उल-जिहाद अल-इस्लामी, 1984

नेतृत्व: मौलाना फ़ज़ल अल रहमान ख़लिल, इलियास कश्मीरी, क़ारी सैफ़ुल्लाह अख़्तर.

कार्यालय : रावलपिंडी.

प्रशिक्षण शिविर: खोस्त.

पंथ: देवबंदी.

कार्यक्षेत्र : खोस्त, अफ़ग़ानिस्तान.

लक्ष्य : अफ़ग़ानिस्तान में रूसी सेना के ख़िलाफ़ लड़ाई.

अभियान: अफ़ग़ानिस्तान में रूसी सेना के ख़िलाफ़ बड़े हमले।


अंजुमन सिपाहे-सहाबा, 1985

नेतृत्व: मौलाना हक़ नवाज़ झांगवी, मौलाना इसरार अल क़ासमी, मौलाना अज़्म तारिक, मौलाना ज़िया-उर-रहमान फ़ारुक़ी.

कार्यालय : झांग.

कार्यक्षेत्र : दक्षिण पंजाब.

पंथ: देवबंदी.

लक्ष्य : पाकिस्तान को सुन्नी राष्ट्र बनाना, विभिन्न उत्सवों के ज़रिए पैगंबर मोहम्मद के साथियों के प्रति सम्मान बनाए रखना और जो लोग शिया हैं उन्हें ग़ैर मुसलमान करार देना.

अभियान: इराक़ी राजनयिक सादिक़ गंजी की हत्या, 1990।

अल-बदर जम्मू-कश्मीर 1988

नेतृत्व: कमांडर बख़्त ज़मीन.

कार्यालय:रावलपिंडी, मुज़्ज़फ़राबाद.

प्रशिक्षण शिविर: खोस्त, मुज़्ज़फ़राबाद.

कार्यक्षेत्र : भारत प्रशासित कश्मीर.

लक्ष्य : किसी भी अन्य पाकिस्तान समर्थक चरमपंथी गुट की तरह इसके निशाने पर भी भारतीय सेना ही रही है.

अभियान: 1995 में श्रीनगर के चरारे शरीफ़ के पास भारतीय सेना के साथ मुठभेड़।

हरकत-उल-मुजाहिदीन 1988

नेतृत्व: मौलाना फ़ज़लुल रहमान खलिल, फ़ारुक़ कश्मीरी, मौलाना मसूद अज़हर.

कार्यालय:रावलपिंडी, मुज़्ज़फ़राबाद.

प्रशिक्षण शिविर: खोस्त, मुज़्ज़फ़राबाद, मनशेरा.

कार्यक्षेत्र : भारत प्रशासित कश्मीर.

पंथ: देवबंदी.

लक्ष्य : भारत प्रशासित कश्मीर में भारतीय सेना के ख़िलाफ़ मुहिम.

अभियान: 1999 में भारतीय विमान का अपहरण।

हिज़्बुल मुजाहिदीन 1989

नेतृत्व: मास्टर एहसान दर, मोहम्मद युसूफ़ शाह आरिफ़, सैयद सलाहुद्दीन, बिलाल अहमद मीर.

कार्यालय:रावलपिंडी, इस्लामाबाद, मुज़्ज़फ़राबाद.

प्रशिक्षण शिविर: खोस्त (अफ़ग़ानिस्तान), कोटली.

कार्यक्षेत्र : भारत प्रशासित कश्मीर.

लक्ष्य : भारत प्रशासित कश्मीर में भारतीय सेना के ख़िलाफ़ मुहिम और कश्मीर का पाकिस्तान में विलय.

अभियान: 1999 में श्रीनगर में भारतीय सेना के मुख्यालय पर हमला।


लश्करे तैबा, 1990

नेतृत्व: ज़िया-उल-रहमान लखवी.

कार्यालय: लाहौर.

प्रशिक्षण शिविर: मुज़्ज़फ़राबाद.

कार्यक्षेत्र : भारत प्रशासित कश्मीर.

लक्ष्य : भारत प्रशासित कश्मीर में भारत को चुनौती देना.

अभियान: मुंबई में 2007 में हुए हमले का आरोप इसी संगठन पर लगा था।

सिपाहे-मोहम्मद,1993

नेतृत्व: ग़ुलाम रज़ा नक़वी, मुरीद अब्बास यज़दानी, मुनव्वर अब्बास अल्वी.

कार्यालय: लाहौर.

कार्यक्षेत्र: पाकिस्तान.

पंथ : एहले-ताशी.

लक्ष्य : एहले-सुन्नत के नेताओं और मस्जिदों को निशाना बनाना.

अभियान: संगठन पर सिपाहे-सहाबा के नेताओं की हत्या का आरोप है।

हरकत-उल-निसार, 1993

नेतृत्व: मौलाना फ़ज़लुल रहमान खलील.

कार्यालय: रावलपिंडी. प्रशिक्षण शिविर मनशेरा, मुज़्ज़फ़राबाद.

कार्यक्षेत्र: भारत प्रशासित कश्मीर.

पंथ : देवबंदी.

लक्ष्य : जम्मू कश्मीर में भारतीय सुरक्षाबलों पर हमला.

अभियान: नई दिल्ली में यूरोपीय पर्यटकों का अपहरण।


अल-फ़रान 1995

नेतृत्व: मौलाना फ़ज़लुल रहमान खलिल, मौलाना मसूद अज़हर.

कार्यालय: कोई नहीं.

प्रशिक्षण शिविर:कोई नहीं.

कार्यक्षेत्र: भारत प्रशासित कश्मीर. /p>

पंथ : देवबंदी.

लक्ष्य : विदेशी पर्यटकों के अपहरण का दावा करना ताकि भारत कश्मीर में दबाव में आ जाए.

अभियान: वर्ष 1995 में पहलगाम में छह पश्चिमी पर्यटकों के अपहरण की ज़िम्मेदारी ली थी।

लश्करे झांगवी, 1996

नेतृत्व: रियाज़ बसरा, अकरम लाहौरी, मलिक इशाक़.

कार्यालय: झांग, कराची.

प्रशिक्षण शिविर: वज़ीरिस्तान.

कार्यक्षेत्र: दक्षिण पंजाब, कराची, कबाइली इलाक़े, अफ़ग़ानिस्तान.

पंथ : देवबंदी.

लक्ष्य : शिया नेताओं को निशाना बनाना और इमामबारगाह पर हमला (जहाँ शिया इबादत करते हैं).

अभियान: वर्ष 2002 में कराची में एक बस पर हमला जिसमें फ़्रांसीसी इंजीनियर जा रहे थे इसमें 11 फ़्रांसीसी नागरिक मारे गए थे।

हरकत-उल-मुजाहिदीन का पुनर्गठन, 1997

नेतृत्व: मौलाना फ़ज़लुल रहमान खलील, फ़ारुक़ कश्मीरी.

कार्यालय: रावलपिंडी, मुज़्ज़फ़राबाद.

प्रशिक्षण शिविर: मनशेरा.

कार्यक्षेत्र: जम्मू कश्मीर.

पंथ : देवबंदी.

लक्ष्य :जम्मू कश्मीर में भारतीय सुरक्षाबलों को निशाना बनाना.

अभियान: 1999 में भारतीय विमान का अपहरण।


जैश-ए- मोहम्मद, 2000

नेतृत्व: मौलाना मसूद अज़हर.

कार्यालय: भावलपुर, काबुल.

प्रशिक्षण शिविर: काबुल, कंधार.

कार्यक्षेत्र: अफ़ग़ानिस्तान, भारत,पाकिस्तान.

पंथ : देवबंदी.

लक्ष्य : अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में विदेशियों और देवबंद से ताल्लुक़ न रखने वाले लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई, जम्मू कश्मीर में भारतीय सेना के ख़िलाफ़ मुहिम.

अभियान: दिसंबर 2001 में भारतीय अर्धसैनिक बलों के अड्डे पर हमला।

लश्कर-ए-उमर 2001

नेतृत्व: अहमद उमर सईद शेख.

कार्यालय: कहीं नहीं.

प्रशिक्षण शिविर: कहीं नहीं.

कार्यक्षेत्र: पाकिस्तान.

पंथ : देवबंदी.

लक्ष्य : पाकिस्तान से अमरीकी सुरक्षा बलों को निकालना.

अभियान: कराची 2002 में अमरीकी पत्रकार डेनियल पर्ल का अपहरण और क़त्ल।

जमात-उद-दावा 2002

नेतृत्व: हाफ़िज़ मोहम्मद सईद, इबाद-उर-रहमान माकी.

कार्यालय: लाहौर.

कार्यक्षेत्र: पाकिस्तान.

पंथ : एहले हदीस.

लक्ष्य : जिहाद के लिए प्रचार-प्रसार करना, समाज सेवा.

अभियान: जमात-उद-दावा के नेता पर 2008 के मुंबई हमलों में शामिल होने का आरोप है।

हिज़्बुत तहरीर विलायाह पाकिस्तान 2002

नेतृत्व: नावेद बट (प्रवक्ता).

कार्यालय: गुप्त.

कार्यक्षेत्र: पाकिस्तान.

लक्ष्य : पाकिस्तान में ख़लीफ़ा की स्थापना.

अभियान: पाकिस्तानी सैनिकों को विद्रोह करने के लिए उकसाने का आरोप।

लश्कर-ए-इस्लाम 2004

नेतृत्व : मंगल बाघ, मुफ़्ती मुनीर शाकिर.

कार्यालय: बारा.

प्रशिक्षण शिविर: बारा .

कार्यक्षेत्र : ख़ाइबर एजेंसी.

पंथ: देवबंदी.

लक्ष्य: ख़ैबर एजेंसी में शरिया लागू करना।

अंसार-उल-इस्लाम 2005

नेतृत्व : महबूब-उर-रहमान, पीर सैफ़ुर रहमान.

कार्यालय: तीरा.

प्रशिक्षण शिविर: तीरा .

कार्यक्षेत्र : ख़ैबर एजेंसी.

पंथ: बरेलवी.

लक्ष्य: लश्करे इस्लाम से संघर्ष।

शूरा-ए-इत्तेहादुल मुजाहिदीन 2006

नेतृत्व : हाफ़िज़ गुल बहादुर.

कार्यालय: मीरान शाह, उत्तरी वज़ीरिस्तान.

प्रशिक्षण शिविर: दाता खेल, उत्तरी वज़ीरिस्तान .

कार्यक्षेत्र : अफ़ग़ानिस्तान.

पंथ: देवबंदी.

लक्ष्य: अफ़ग़ानिस्तान में गठबंधन सेना से लड़ना और पाकिस्तान के साथ दोस्ताना रहना।

मौलवी नज़ीर ग्रुप 2007

नेतृत्व : मौलवी नज़ीर.

कार्यालय: उत्तरी वज़ीरिस्तान.

प्रशिक्षण शिविर: उत्तरी वज़ीरिस्तान .

कार्यक्षेत्र : अफ़ग़ानिस्तान.

पंथ: देवबंदी.

लक्ष्य: अफ़ग़ानिस्तान में गठबंधन सेना से लड़ना और पाकिस्तान के साथ दोस्ताना रहना।

तहरीके पाकिस्तान 2007

नेतृत्व : बैतुल्लाह महसूद, हकीमुल्लाह महसूद, मौलवी फ़क़ीर मोहम्मद.

कार्यालय: दक्षिण वज़ीरिस्तान.

प्रशिक्षण शिविर: दक्षिण वज़ीरिस्तान.

कार्यक्षेत्र : फ़ाटा, पाक-अफ़ग़ान सीमा के इलाक़े बाजौड़ तक, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान.

पंथ: देवबंदी.

लक्ष्य: तालिबान स्टाइल शरिया प्रणाली लागू करना, गठबंधन सेना के ख़िलाफ़ लड़ना.

अभियान: पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो पर आत्मघाती हमला जिसमें वे 2007 में मारी गई थीं।

अमर बिल मारूफ़ 2008

नेतृत्व : मौलाना नामदार.

कार्यालय: ख़ैबर एजेंसी.

प्रशिक्षण शिविर: ख़ैबर एजेंसी.

कार्यक्षेत्र : अफ़ग़ानिस्तान.

पंथ: देवबंदी.

लक्ष्य: अफ़ग़ानिस्तान में गठबंधन सेना से लड़ना और पाकिस्तान के साथ दोस्ताना रहना।

हक़्क़ानी नेटवर्क 2008

नेतृत्व : जलालुद्दीन हक़्क़ानी, सिराजुद्दीन हक़्क़ानी.

कार्यालय: उत्तरी वज़ीरिस्तान, पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान.

प्रशिक्षण शिविर: उत्तरी वज़ीरिस्तान, पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान.

कार्यक्षेत्र : अफ़ग़ानिस्तान.

पंथ: देवबंदी.

लक्ष्य: अफ़ग़ानिस्तान में गठबंधन सेना से लड़ना और पाकिस्तान के साथ दोस्ताना रहना।

मोमिन ग्रुप 2010

नेतृत्व : मोमिन.

कार्यालय: दर्रा आदमख़ैल.

प्रशिक्षण शिविर: दर्रा आदमख़ैल.

कार्यक्षेत्र : अफ़ग़ानिस्तान.

पंथ: देवबंदी.

लक्ष्य: अफ़ग़ानिस्तान में गठबंधन सेना से लड़ना और पाकिस्तान के साथ दोस्ताना रहना.

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